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बगैर सीएम चेहरे के अखिलेश यादव के सामने बौनी दिख रही बीजेपी

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उत्तर प्रदेश में चुनावी समर अपने लबो-लुआब पर है। एक तरफ यूपी के सीएम अखिलेश यादव अपने काम के बूते पूरे में जनता के बीच जाकर उनसे वोट मांग रहे हैं। तो वहीं दूसरी तरफ बीजेपी और बीएसपी उन्हें लगातार बदनाम करने को कोशिशों में लगे हुए हैं। लेकिन जब बात आम जनमानस की राय सबके सामने आती है और ये पूछा जाता है कि यूपी के सेहरा किसके सर पर बांधा जाना चाहिए। तो जनता के एक राय होकर अखिलेश यादव का नाम सबसे पहले लेती है। ऐसा इसलिए क्योंकि बीजेपी के पास प्रदेश में ऐसा कोई नेता ही नहीं है। जो यूपी का मुख्यमंत्री बनने लायक हो। क्योंकि अखिलेश यादव ने यूपी में जिस तरह से बेहद संतुलित ढंग से विकास कार्यों को अंजाम दिया है। उसको अगर देखा जाये तो वह दोबारा सीएम बनने के हकदार बन जाते हैं। उनकी सहजता की वजह से बसपा सुप्रीमो मायावती को जनता ऐसे ख़ारिज करती है। मानो वह यूपी चुनाव की रेस हैं ही नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि अपने पिछले कार्यकाल में मायावती ने यूपी में विकास के बजाय राजधानी लखनऊ में जगह-जगह पत्थरों के पार्क और हाथी बनाया था। साथ ही वह जनता के करीब कभी नहीं रहीं। जिसकी वजह से मायावती को लोग बतौर सीएम पसंद ही नहीं करते हैं।

मोदी के सहारे बीजेपी

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बिहार में बीजेपी की हार की सबसे बड़ी वजह किसी लोकप्रिय स्थानीय नेता की कमी बताई गई थी। यानी 2014 की मोदी लहर बिहार चुनाव के आते-आते खत्म हो गई थी। जनता स्थानीय स्तर पर भी अच्छे प्रत्याशी चाहती है। वो चाहती है कि ऐसे जनप्रतिनिधि हों जो स्थानीय समस्याओं पर ध्यान दे सकें, उनकी सुनें। हर बार राष्ट्रीय स्तर की लहर से किसी भी दल का काम नहीं चलने वाला। फिर लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जनता का मूड भी अलग होता है। बिहार और दिल्ली में हार से बीजेपी को ये सबक मिला है। वहीं यूपी की जनता को पता है कि अगर वो समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन को वोट देगी तो अखिलेश यादव सीएम बनेंगे। जबकि बीजेपी के बारे में उसे पता ही नहीं कि जीत के बाद किस नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा’

बीजेपी में नेताओं की कमी 

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बीजेपी के बारे में ये समीक्षा काफी हद तक सही है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी के पास कई नेता हैं। जैसे योगी आदित्यनाथ, उमा भारती, कलराज मिश्र या प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य। इन सभी नेताओं की कुछ खास इलाकों में भले ही अच्छी पैठ हो। लेकिन प्रदेश स्तर पर ये नेता अखिलेश यादव के कद के सामने कहीं नहीं टिकते हैं। यूपी में अमित शाह भी खूब प्रचार कर रहे हैं। लेकिन अमित शाह एक रणनीतिकार ज्यादा हैं, जननेता कम लगते हैं। आम जनता बोलते हुए उन्हें जरा भी पसंद नहीं करती है। वहीं अखिलेश यादव को सुनने इन चुनावों में सबसे ज्यादा भीड़ जुट रही है। उनकी सहजता जनता को खूब पसंद आई है। अब बीजेपी की लाचारी का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि वह सीएम अखिलेश यादव के सामने पीएम मोदी को मैदान में लाये हैं। लेकिन अभी तक हर मामले में अखिलेश यादव उनसे आगे चल रहे हैं। अखिलेश यादव मीडिया के सवालों का जवाब देते हैं। वहीं पीएम मोदी रैली तो करते हैं। लेकिन अपने काम काज का हिसाब देने के लिए मीडिया के सामने आने से बचते हैं। यही वजह है कि तमाम ओपिनियन पोल में मतदाताओं की पहली पसंद बतौर सीएम अखिलेश यादव सबसे आगे रहे हैं।

मोदी भी जीत नहीं दिला सकते 

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सूबे में सिर्फ मोदी के बूते चुनाव जीतने का सपना पाले बीजेपी के सामने सबसे बड़ी संकट उत्पन्न करते हुए अखिलेश यादव नजर आ रहे हैं। नहीं जीता जा सकता। और पार्टी हार की सूरत में ब्रांड मोदी को बचाना चाहेगी। पार्टी यूपी में अपनी तमाम होर्डिंग्स में मोदी को सबसे बड़े चेहरे के तौर पर पेश करती है। स्थानीय नेता, मोदी के आगे बौने नजर आते हैं। यानी बिहार वाला फॉर्मूला यहां दोहराने की कोशिश हो रही है। बीजेपी का सबसे अलग पार्टी होने का दावा गलत साबित होता है। जब से मोदी पीएम बने हैं, बीजेपी का अंदरूनी लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हुआ है। जिन राज्यों में बीजेपी के पास स्थानीय नेताओं की पहले से ही कमी थी, वहां कोई नया नेता भी नहीं उभर सका है। मोदी का कद बड़ा होने से आज बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी दिखती है। बिना मोदी के करिश्मे और लोकप्रियता के पार्टी का काम नहीं चल पा रहा है। मगर ऐसा करके बीजेपी किसी और नेता के उभरने की संभावनाएं भी खत्म कर दे रही है।

 

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