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अखिलेश-राहुल के समीकरण से विधानसभा के साथ दिलचस्प होगा 2019 का लोकसभा चुनाव

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13 February 2017

यूपी विधानसभा का इस बार का चुनाव ना सिर्फ प्रदेश की सियासत तक सिमटा है बल्कि आगामी लोकसभा चुनाव की तस्वीर भी साफ करेगा। जिस तरह से अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने प्रदेश के चुनाव से पहले साथ आने का ऐलान किया है वह इस ओर साफ इशारा कर रही है कि दोनों दल इस चुनाव से इतर 2019 के लोकसभा चुनाव को भी अपने एजेंडे में सबसे ऊपर रखना चाहते हैं। दोनों ही दलों ने प्रदेश में एक साथ आकर केंद्र की राजनीति को साधने की कोशिश शुरू कर दी है।

दोनों ही दल खुद को प्रदेश के सबसे बड़े सेक्युलर दल के रूप में लोगों के सामने रख रहे हैं, ऐसे में प्रदेश में एक तरफ जहां भाजपा और बसपा के लिए मुश्किलें बड़ी हो सकती हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में लंबे समय से चल रहा वनवास खत्म हो सकता है। कांग्रेस अखिलेश यादव नाम के लोकप्रिय चेहरे के साथ खुद को प्रदेश में मजबूत करना चाहती है। वर्ष 2004 में भी कांग्रेस ने तमाम छोटे दलों के साथ गठबंधन करके एनडीए को हराने का आह्वान किया था और पार्टी को जीत हासिल हुई थी, ठीक उसी तर्ज पर एक बार फिर से कांग्रेस यूपी से इस रणनीति का आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इस काम को आगे बढ़ाने के पीछे प्रियंका गांधी और डिंपल यादव ने अहम भूमिका निभाई थी।

प्रदेश में सपा-कांग्रेस के गठबंधन के बाद दोनों ही दल यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि यह गठबंधन अजेय है और यह गठबंधन आगामी लोकसभा चुनाव में जीत का फार्मूला साबित हो सकता है। एक तरफ जहां सपा इस बात को आगे बढ़ा रही है कि आप हमें सीएम की कुर्सी तक पहुंचाने में मदद कीजिए तो हम आपको पीएम की कुर्सी तक पहुंचाने में मदद करेंगे। लेकिन जिस तरह से आज नरेश अग्रवाल ने आज साफ कहा है कि वह अखिलेश यादव को भविष्य में पीएम पद का दावेदार मानते है, यही नहीं खुद अखिलेश यादव अपने पिता को पीएम पद तक पहुंचते देखना चाहते हैं। लेकिन हाल फिलहाल में इस मुद्दे को दोनों ही दल ने किनारे करते हुए प्रदेश में जीत के लिए गठबंधन करने का फैसला लिया है। पहले भी हो चुके हैं ऐसे गठबंधन प्रदेश में दो बड़े दल जब भी एक साथ आए हैं उसके पीछे उनके अपने सियासी हित थे, 1993 में जब सपा-बसपा साथ आए थे तो दोनों की गठबंधन वाली सरकार सिर्फ छह-छह महीने के फार्मूले पर बनीं, लेकिन मायावती के बाद मुलायम सिंह को सीएम पद तक पहुंचने से मायावती ने रोक दिया। 1989 में भी सपा और भाजपा साथ आए लेकिन अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के बाद जब आडवाणी को गिरफ्तार किया गया तो भाजपा ने अपना समर्थन वापस ले लिया। कांग्रेस और बसपा 2001 में भी एक साथ आ चुके हैं और बसपा ने सपा को सरकार बनाने के लिए अपना समर्थन दिया था। कई ऐसे मौके सामने आए जब सपा और बसपा ने कांग्रेस और भाजपा को रोकने के लिए एक साथ आ चुकी थी लेकन 2007 में जब प्रदेश में पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो प्रदेश में गठबंधन की राजनीति को विराम लग गया था। लेकिन इस बार एक बार फिर से गठबंधन की राजनीति प्रदेश में दम भरने लगी है। बहरहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि इस चुनाव के बाद 2019 में दोनों दल किन बातों पर एक दूसरे को साथ लेकर चलने को तैयार होते हैं।

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