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रथ यात्रा स्पेशल : विपक्षी तलाशते रहे दंगे कराने का बहाना, अखिलेश गाते रहे विकास का तराना

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03 November 2016

उत्तर प्रदेश में जब-जब चुनाव के मौसम आते हैं राजनीतिक दल सांप्रदायिकता फैलाने वाले मुद्दे किसी भी तरह हवा में उछालने की कोशिश में जुट जाते हैं। लेकिन यह पहली बार हुआ है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विपक्षी दलों के ऐसे मुद्दों हवा या यूं कहें महत्व नहीं देते हुए उन जगहों पर भी विकास को तरजीह दी है, जो मसले व स्थान इन दलों के लिए सियासत चमकाने का शिगूफा रहे हैं। हाल की घटनाक्रमों पर गौर करें। केंद्र की भाजपा सरकार के पर्यटन मंत्री महेश शर्मा अयोध्या आते हैं और वहां म्यूजियम बनाने की घोषणा कर जाते हैं। उनकी यह घोषणा भी पार्टी के कद्दावर नेता विनय कटियार को नागवार गुजरती है और कटियार सवाल करते हैं कि भाजपा कब तक जनता को लॉलीपॉप देकर फुसलाएगी। अब जरा 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के घोषणा पत्र पर भी गौर करें। पार्टी के मैनिफेस्टो में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का जिक्र तो था, लेकिन नीचे से दूसरे पायदान पर। आशय साफ है, भाजपा के लिए यह मुद्दा सिर्फ हिन्दू वाटों के ध्रुवीकरण तक सीमित है। अब यह भी गौर करें कि अखिलेश सरकार ने क्या किया? अखिलेश सरकार ने अभी तक राजनीति का अखाड़ा बने अयोध्या की सूरत संवारने का काम किया है। 1992 के बाबरी विध्वंस कांड के बाद यह पहला मौका है जब वहां विकास कार्य किए जा रहे है। अखिलेश सरकार में सरयू नदी के घाटों का सुंदरीकरण किया जा रहा है तो थीम पार्क का शिलान्यास किया गया। जहां धार्मिक मुद्दों को लेकर भाजपा हमेशा भड़काने वाली राजनीति करती रही है, वहीं अखिलेश सरकार में विकास पर फोकस करते हुए धार्मिक स्थलों को संवारने के काम किए जाते रहे हैं।

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हर धर्म के धार्मिक स्थलों को विकसित करने पर अखिलेश सरकार का ध्यान

बात सिर्फ अयोध्या की नहीं है। अखिलेश सरकार में हर धर्म के धार्मिक स्थलों को विकसित करने पर ध्यान दिया गया है। वाराणसी में घाटों को लखनऊ के गोमती रिवर फ्रंट योजना की तर्ज पर संवारा जा रहा है तो मथुरा में भी सौन्दर्यीकरण की तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं। गाजियाबाद में हज हाउस का निर्माण किया गया है। निःसंदेह जब सरकारें राजनीतिक दलों को बनानी होती है तो राजनीति तो वे करेंगे ही, लेकिन बात वहां बिगड़ती है कि जब लाभ के बजाय दल धार्मिक भावनाओं के खिलवाड़ कर लोभ की राजनीति करने लगते हैं। इससे विपरीत अखिलेश यादव ने सदैव जनता के लाभ की राजनीति की। यही वजह है कि उन्हें समाजवादी श्रवण यात्रा कर हर धर्म के बुजुर्गों के लिए तीर्थयात्रा का सपना साकार किया। वहीं सिंधु यात्रा और मानसरोवर यात्रा कर आने वाले यात्रियों को अनुदान देकर धार्मिक सदभाव का भी मार्ग प्रशस्त किया। अभी तक धार्मिक धु्रवीकरण की राजनीति में किसी दूसरी सरकार में इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए थे, जैसे अखिलेश यादव ने धर्म को भी विकास से जोड़कर किया। अखिलेश यादव ने अपने सरकार में सुनिश्चित किया कि प्रदेश के सभी धार्मिक महत्व के स्थलों पर 24 घंटे बिजली मिले ताकि लोगों की आस्था में कोई व्यावधान न आए।

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बीजेपी न तो इतिहास को याद रख सकी है, न ही उसके सबक आत्मसात कर पाई है

पुरानी कहावत है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है। पर कुछ राजनीतिक दल मानो इस सत्य से परिचित नहीं होते। उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए होनेवाले आगामी चुनावों में राम मंदिर निर्माण को एक मुद्दे के रूप में उभार कर भाजपा के चुनावी रणनीतिकारों ने यह साफ कर दिया है कि वे न तो इतिहास को याद रख सके हैं, न ही उसके सबक आत्मसात कर पाये हैं। वैसे सांप्रदायिक राजनीति में सिर्फ बीजेपी ही आगे नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अयोध्या यात्रा के 28 साल बाद उनके पुत्र और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी वहां पहुंचे तो उनका मकसद भी धु्रवीकरण की राजनीति ही थी। अभी वाराणसी में इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन तलाक का मुद्दा छेड़ा तो बसपा सुप्रीमा को इसमें राजनीति चमकाने की मलाई नजर आने लगी। सो उन्होंने छट से मुद्दा लपकते हुए उन पर किसी दूसरे धर्म के मसलों से छेड़छाड़ नहीं करने नसीहत दे दी। जबकि उन्हें भी सबक लेना चाहिए कि 1992 के बाद भाजपा को ऐसे मुद्दों से कभी फायदा नहीं हुआ, जबकि इसके विपरीत जनता का हर बार अहित ही हुआ है।

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धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़, मकसद सिर्फ वोट हाथियाना

दरअसल धर्म और सांप्रदायिक कट्टरता को एक आंख से देखा जाना बेहद खतरनाक है। सियासत जिस तरह से सांप्रदायिक राजनीति कर रही है, यह कभी भी विस्फोटक रूप ले सकती है। धर्म और सांप्रदायिकता में भेद के बारे प्रख्यात वैज्ञानिक व भारत सरकार के पूर्व सचिव डॉ. मंगला राय का मानना है कि चुनावी राजनीति में धर्म के आधार पर हो रहे विघटन को रोकने के लिए व्यवस्था में  बदलाव लाना बेहद जरूरी है। पर मौजूदा परिवेश को देखा जाए तो एक तरह से देखा जाए तो कमोबेश हर दल विभिन्न धर्मों की भावनाओं से खिलवाड़ कर सिर्फ वोट हाथियाने के मकसद साध रहे हैं। ऐसे में अखिलेश यादव तरह की राजनीति में सूर्य की तरह दमकते हुए उत्तर प्रदेश में नई तरह की विकास की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। 3 नवंबर से शुरू होने वाली उनकी विकास रथयात्रा भी इसी मकसद को आगे बढ़ाने की अगली कड़ी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि विकास के मार्ग पर बढ़ते हुए वह उत्तर प्रदेश को नई दिशा देने के अपने संकल्प में विजय प्राप्त करेंगे।

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