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गुमशुदा बच्चों की तलाश में यूपी से शुरू हुआ ऑपरेशन स्माइल ने दिखा रहा पूरे देश को राह

April 29, 2016

गाजियाबाद के लोनी में आठ साल के आशु को पिता ने चाउमीन का कुछ सामान लेने भेजा। सामना खरीद कर लौटे आशु के पास बचे रुपयों में पांच रुपये गायब मिले। इस पर पिता ने उसे पांच रुपये नहीं लाने पर चमड़ी उधेड़ देने की घुड़की देकर सिक्का तलाश कर लाने को कहा। आशु दिनभर पांच का सिक्का तलाशता रहा था, पर उसे कामयाबी नहीं मिली। उधर, उसके दिल में पिता के हाथों जानवरों जैसी पिटाई का खौफ बैठ गया तो उसने घर छोड़ने का फैसला कर दिया। गाजियाबाद के ही विजयनगर मोहल्ले में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले नौ साल के मोहित को उसका शराबी पिता रोज पीटता था। वह दर्द सहता रहता था। पर एक दिन मोहल्ले के दूसरे लड़के ने उसे अपनी ऐसी ही आपबीती सुनाई तो मोहित के लिए वह दिन निर्णायक हो गया। दोनों बच्चे उस दिन के बाद विजयनगर इलाके में नहीं दिखें।

Image Source: indiatoday.in

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ये और ऐसे सैकड़ों बच्चों के गुम होने की रिपोर्ट गाजियाबाद के अलग-अलग थानों में दर्ज होती रहीं, लेकिन एक दिन अचानक चीजें बदलने लगीं। इस बदलाव से न सिर्फ गाजियाबाद के खोए बच्चे मिलने लगे बल्कि उत्तर प्रदेश के कई जिलों और देश के बाकी हिस्सों के बच्चे भी बरामद होने लगे। दरअसल यह उत्तर प्रदेश पुलिस, और साफ-साफ कहें तो गाजियाबाद पुलिस की उन कोशिशों को नतीजा था, जिसे ऑपरेशन स्माइल का नाम दिया गया। सितंबर 2014 में शुरू किए गए इस ऑपरेशन को उत्तर प्रदेश सरकार ने हाथों-हाथ लिया तो बिछड़े बच्चों के मिलने का सिलसिला शुरू हो गया। फिर क्या था, ऑपरेशन का कारवां यूपी से आगे बढ़ा और अब केंद्र सरकार भी इस माड्यूल और इसी नाम के साथ ऑपरेशन स्माइल और ऑपरेशन मुस्कान चलाकर देशभर में अपनों बिछड़े बच्चों को उनके परिवारों से मिलने का अभियान चला रही है।

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ऐसे हुई ऑपरेशन स्माइल की शुरुआत

पेशे से गाजियाबाद के एसएसपी और दिल से वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर धर्मेंद्र सिंह ने पुलिस टीम के साथ 14 सितंबर 2014 को गाजियाबाद में एक जगह छापा मारकर 51 बंधुआ बाल मजदूर छुड़ाए। एक साथ इतने बच्चों की रिहाई के बाद धर्मेंद्र के दिमाग में यह बात आई कि अगर एक कार्रवाई में दूसरे राज्यों के इतने बच्चे छुड़ाए जा सकते हैं तो गाजियाबाद के गायब बच्चों की सुध क्यों न ली जाए, उन्होंने गाजियाबाद सीओ रणविजय सिंह को गुमशुदा बच्चों की बरामदगी का खाका तैयार करने को कहा। दो दिन के भीतर पुलिस कप्तान के हाथ में 127 ऐसे बच्चों की सूची थी।

सिर्फ दिखावे के लिए नहीं शुरू किया ऑपरेशन, बल्कि पूरी स्टडी की

लिस्ट तो सामने थी, लेकिन बच्चे कहां होंगे और इसके लिए इतने बड़े देश में कहां छापेमारी की जाए। इसका हल निकला उन पुराने रिकॉर्ड से, जिससे पता चला कि गाजियाबाद से गायब हुए ज्यादातर बच्चे इससे पहले पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन, हर की पौड़ी, हरिद्वार, देहरादून, गुडगांव, चंडीगढ़ और फरीदाबाद से बरामद हुए हैं। इसके अलावा जिन शहरों से गाजियाबाद के बच्चे मिले उनमें जयपुर, मुंबई और कोलकाता शामिल थे। दूसरी बात यह पता चली कि ज्यादातर मामलों में अगर बच्चे सेक्स रैकेट का शिकार नहीं हैं तो वे रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, बड़े चौराहों, फ्लाईओवर के नीचे, बड़े मंदिर या दरगाह या फिर बहुत से मामलों में एनजीओ और शेल्टर हाउस में मिलते हैं। यानी वे किसी संगठित अपहरण गैंग के पास न होते हुए भी इसलिए अनाथ हैं, क्योंकि उन्हें खोजने की गंभीर कोशिश नहीं हो रही है।

Image Source: indiatoday.in

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वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर पाई बड़ी कामयाबी

पुलिस ने इस काम में नारेबाजी की बजाए पूरी वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर बड़ी कामयाबी पाई। इसलिए गाजियाबाद पुलिस ने अपने ऑपरेशन में आधुनिक तकनीक, मोबाइल फोन, व्हाट्सऐप, फेसबुक और जरूरत पडने पर वीडियो चैटिंग का खूब उपयोग किया। इंदिरापुरम थाने के सब इंस्पेक्टर प्रमोद कुमार को बखूबी याद है कि गुजरात के भरुच जिले के एक बच्चे के गांव का सही पता उन्होंने फेसबुक के अपने एक दोस्त से हासिल किया था और वहां के थाने में पता किया था कि क्या बच्चे की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज है, आने-जाने का समय और धन बचाने के लिए उन्होंने व्हाट्सऐप पर ही बच्चे के परिजनों को फोटो भी भेज दिए थे।

एसएसपी ने सीओ से कहा- ध्यान रखना, तुम ड्यूटी पर नहीं, हज पर जा रहे हो

नई सोच के साथ 127 बच्चों को खोजने निकली गाजियाबाद पुलिस की 38 टीमों के पास महीने भर बाद 227 बरामद बच्चे थे। रणविजय बताते हैं- मुझे याद है कप्तान साहब ने सब पुलिस वालों से कहा कि एक बार सोचो, तुम्हारा अपना बच्चा खो गया है, अगर ऐसा होता तो तुम्हें कितना दर्द होता। ध्यान रखना, तुम ड्यूटी पर नहीं, हज पर जा रहे हो। बरामद बच्चों में से 80 गाजियाबाद के और बाकी 147 बच्चे दूसरे जिलों और राज्यों के थे, ऑपरेशन की कामयाबी देखते हुए 8 अक्तूबर को उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक आनंदलाल बनर्जी ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में ऑपरेशन स्माइल शुरू करने की घोषणा की।

Image Source: aajtak.intoday.in

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ऑपरेशन मुस्कान और ऑपरेशन मुस्कान की सफलता

गुमशुदा एवं लावारिश बच्चों की तलाश व पुर्नवास के संबंध में पुलिस द्वारा वर्ष 2015 में दो विशेष अभियान ऑपरेशन मुस्कान एवं ऑपरेशन स्माइल के नाम से चलाए गए। ऑपरेशन मुस्कान में 1220 एवं ऑपरेशन स्माइल में 855 विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों को तलाश कर या तो उनके अभिभावाकों के सुपुर्द किया गया या पुर्नवास हेतु भेजा गया।

Image Source: weuttarpradesh.org

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और अब बिछ़ड़े युवक-युवतियों को मिलाएगा ‘ऑपरेशन मिलन’

उत्तर प्रदेश पुलिस का ऑपरेशन मिलन 459 घरों में दोबारा खुशियां लाएगा। दरअसल पुलिस ने इस नाम से लखनऊ जोन में आने वाले 11 जनपदों में ऐसे युवक-युवतियों को तलाशने का काम शुरू कर रही है, जिन्हें बहला फुसलाकर या किसी अन्य तरह से उनका अपहरण कर लिया गया हो। लखनऊ पुलिस महानिरीक्षक ए.सतीश गणेश ने इसके लिए सभी पुलिस अधीक्षकों को 15 दिन का समय दिया है। इस दौरान जिस भी थाना क्षेत्र में अपहरण की घटनाएं सामने आई हैं, वहां के पुलिस प्रभारियों को ऐसे युवक-युवतियों की सघन तलाश कर उन्हें उनके घर तक पहुंचाने का निर्देश दिया गया है। इस काम में पुलिस सर्विलांस का भी सहयोग लेगी। 15 दिन बाद जोन के सभी कप्तानों से पूछा जायेगा कि उनके जिले के सभी थाना प्रभारियों ने इस अभियान में कितने अपहृत लोगों को बरामद किया इसकी समीक्षा बैठक की जाएगी। इस अभियान में बेहतर काम करने वाले पुलिसकर्मियों को आईजी जोन के द्वारा सम्मानित किया जायेगा। आईजी ने बताया इस अभियान में संतोषजनक काम न करने वाले पुलिसकर्मियों के विरुद्ध अपने स्तर से दण्डात्मक कार्यवाई करेंगे।

पीड़ित परिवारों के साथ होगी मीटिंग

इस अभियान में पुलिसकर्मियों की हकीकत जानने के लिए पीड़ित परिवारों के साथ मीटिंग की जाएगी। जोन के सभी जिलों के पुलिस अधीक्षक अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में पीड़ितों के साथ संयुक्त मीटिंग कर प्रगति जानेंगे इसमें पीड़ित परिवारों का सहयोग की जरूरत है। लखनऊ जोन के अंतर्गत आने वाले हरदोई में 33, खीरी में 52, लखनऊ में 140, रायबरेली में 35, सीतापुर में 56, उन्नाव में 32, फैजाबाद में 22, सुल्तानपुर में 17, बाराबंकी में 46, अम्बेडकरनगर में 15 और अमेठी में 21 युवक/युवतियां अपहृत हैं। आईजी ने इस अभियान की अवधि पूरी होने के बाद 20 मई 2016 तक तत्थ्यात्मक रिपोर्ट पेश करने के जोन के सभी कप्तानों को निर्देश दिए हैं। इस जोन में अपहरण के कुल 459 मामले दर्ज कराए गए हैं, जिसमें से सर्वाधिक 140 केस लखनऊ के हैं।

 

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