Uttar Hamara logo

पहले चरण में सपा कांग्रेस गठबधंन सबसे आगे

12 February 2017

सियासत का समीकरण आंकड़ों के कैलकुलस पर नहीं केमिस्ट्री पर निर्भर करता है। तो इस बार समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन या साफ़-साफ़ कहें तो अखिलेश यादव और राहुल गाँधी की केमिस्ट्री असर दिखाने लगी। पहले चरण के लिए शनिवार 11 फरवरी को संपन्न हुए मतदान के बाद वोटरों का रुझान तो यही कह रहा है। इस रुझान के आधार पर कहें तो सीधे तौर पर ये बात निकल कर आती है कि यूपी को ये साथ पसंद है।

16473121_1346220172067489_3625433116749561406_n

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए पहले चरण में 15 जिलों की 73 सीटों पर वोट डाले गए। करीब 63 फीसदी मतदान हुए। गौर करने वाली बात ये है कि इस चुनाव में 2014 के लोकसभा चुनाव जैसा ध्रुवीकरण देखने को नहीं मिल रहा है। पहले चरण के लिए मतदान को लेकर रुझानों के आधार पर सूत्रों ने जो सीटों का बंटवारा किया है उसमें अकेले समाजवादी पार्टी को 28 से 30 सीटें मिलती दिख रही हैं। वहीं कांग्रेस के प्रत्याशी भी पिछले विधानसभा चुनाव से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। इससे एक बात तो पक्की है कि पश्चिम यूपी के मतदाताओं में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन को लेकर विश्वास बढ़ा है। वहीं भाजपा को दूसरा और बसपा को तीसरा स्थान मिलता दिख रहा है। जबकि राष्ट्रीय लोकदल यानी आरएलडी की हालत पतली होती दिख रही है।

19

यहाँ ये जान लेना भी जरूरी है कि 2012 के विधानसभा के हिसाब से यहां पर 24-24 सीटें समाजवादी पार्टी और बसपा ने जीती थीं, 9 आरएलडी, 11 भाजपा और पांच कांग्रेस के खाते में गईं थी। इस तरह से 2012 की तुलना में इस बार समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन आगे बढ़ता नजर आ रहा है। वहीँ बसपा को बड़ा नुकसान होने का अनुमान है। सूत्रों का कहना है कि बसपा सुप्रीमो मायावती की ‘सोशल इंजीनियरिंग-2’ इस बार लगातार दूसरी बार भी फेल होती दिख रही है, वहीं भाजपा के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशें भी परवान चढ़ती नहीं दिख रही हैं। शायद यही वजह है कि कभी कैराना से धर्म विशेष के पलायन का मुद्दा उठाने वाले सांसद हुकुम सिंह अपने पहले के दिए गए बयान से पलट गए हैं। तो सरधना में बूथ पर हंगामा करते बीजेपी विधायक संगीत सोम की बौखलाहट भी सामने दिखाई दी। ये  दोनों तस्वीरें भाजपा की निराशा की ओर इशारा करती हैं।

 

गौर करने वाली बात ये है कि कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रसूख रखने वाले राष्ट्रीय लोकदल के लिए  इस बार अस्तित्व का इम्तिहान है। आरएलडी मुखिया अजित सिंह और उनके बेटे पूर्व सांसद व दल के राष्ट्रीय महासचिव जयंत चौधरी के भविष्य को भी यह चुनाव तय करने वाला होगा। क्योंकि ब्रज क्षेत्र को छोड़कर कहीं भी यह दल मुकाबले में भी नजर नहीं आ रहा है।

पहले चरण में एक और बात सामने आई कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ आने से खासकर युवा और महिला मतदाताओं में अखिलेश यादव और राहुल गाँधी की जोड़ी के प्रति क्रेज बढ़ा है। ऐसे में दो युवा नेताओं के नेतृत्व से प्रदेश के युवा वोटर भी गठबंधन की ओर झुकते नजर आ रहे हैं। वहीं विभिन्न वर्गों और समुदायों में भी यह गठबंधन विश्वास कायम करता दिख रहा है। इस बीच रोचक पहलू ये भी सामने आया है पांच साल सरकार चलाने के बाद भी समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव को लेकर जनता के बीच कोई नाराजगी नहीं है, अलबत्ता लोग अखिलेश यादव के कार्यकाल में किए गए विकास कार्यों की चर्चा ही करते दिखे।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ आने का फायदा यह भी हो रहा है कि दोनों दलों के परम्परागत वोट इस बार संयुक्त होकर गठबंधन के प्रत्याशियों को मिल रहा है। इससे मतों में बिखराव की गुंजाइश भी कम हो गई हैं। यहाँ सीएम अखिलेश यादव की ये बात भी मौजू है कि ‘कांग्रेस का हाथ साइकिल पर आने से जीत को लेकर जो दुविधा थी वो भी दूर हो गई है।’ बहरहाल पहले चरण की हवा तो गठबंधन के हक में बहती मालूम हो रही है और दूसरे चरण में चुनाव वाले कई इलाकों का मिजाज भी पहले चरण के इलाकों सा ही है तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अगर ये हवा दूसरे, फिर तीसरे-चौथे से लेकर सातवें चरण तक यूँ ही बहते रहे। अगर ऐसा होता है तो निश्चित तौर पर ये ऐतिहासिक होगा, क्योंकि 27 साल से उत्तर प्रदेश में लगातार दूसरी बार किसी दल की सरकार नहीं बनी है।

उत्तर हमारा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Uttar Hamara

Uttar Hamara

Uttar Hamara, a place where we share latest news, engaging stories, and everything that creates ‘views’. Read along with us as we discover ‘Uttar Hamara’

Related news