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राजीव गांधी ने ही तैयार कर दी थी बाबरी विध्वंस की जमीन

 

rajeev gandhi

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12 September 2016

सत्ता की सियासत में धर्म का इस्तेमाल बीजेपी का तो पुराना हथकंडा है ही अब इसी हथकंडे से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी अपनी पार्टी को उत्तर प्रदेश चुनाव की वैतरणी पार करना चाहते हैं। अपनी किसान यात्रा के दौरान उन्होंने अयोध्या में हनुमान गढ़ी के दर्शन तो किए लेकिन विवादित स्थल पर रामलला के दर्शन से परहेज किया है। राहुल का यह कदम कुछ उस कहावत जैसा ही लगता है कि ‘खाजा खाना भी है और बचाना भी’ है। मलतब हिन्दुओं को रिझाना तो है, लेकिन मुसलमानों का नाराज नहीं करना है। बहरहाल राहुल गांधी की ये सियासी चाल क्या गुल खिलाएगी, वो तो 2017 में विधानसभा चुनाव के बाद ही पता चल सकेगा, लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो कांग्रेस की राजनीति में धार्मिक पुट साफ दिखता हैं। अयोध्या के विवाद की मलाई भले ही बीजेपी चख रही हो, लेकिन ये कांगे्रस ही रही है जो इस विवाद हवा देती रही है।

Rahul gandhi

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1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री और राहुल के पिता राजीव गांधी ने कांग्रेस के लोकसभा चुनाव प्रचार की शुरुआत अयोध्या से की थी। हालांकि तब वे हनुमान गढ़ी नहीं जा पाए थे, जबकि यह उनके कार्यक्रम में था। अयोध्या से चुनाव प्रचार की शुरुआत का मकसद भी धार्मिक आधार पर लोगों को अपने पक्ष में जोड़ना था। लेकिन 1992 में बाबरी कांड के बाद जब मामला कांग्रेस के हाथ से फिसला तो इस पार्टी के किसी नेता ने इस जगह की सुधि लेने की जरूरत नहीं समझी। 1990 में सद्भावना यात्रा के दौरान राजीव गांधी का काफिला अयोध्या से हुआ था, लेकिन तबसे हनुमान गढ़ी तो दूर, अयोध्या भी उनके परिवार का कोई कांग्रेसी नहीं गया। सोनिया ने भी फैजाबाद में तो सभाएं कीं लेकिन अयोध्या से वे दूर ही रहती आई है। इस बार भी राहुल गांधी का हनुमान गढ़ी के दर्शन करने का पहले कोई कार्यक्रम नहीं था, उसे अचानक जोड़ा गया। इसके साथ किचैछा में दरगाह जाने का भी रातोंरात कार्यक्रम बन गया। कोशिश ये दिखाने की हुई थी कांग्रेस धार्मिक सद्भाव वाली पार्टी है। पर ऐसा है क्या?

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जितना पुराना अयोध्या का विवाद है उससे कहीं पुरानी इस जगह को लेकर कांग्रेस की पर्दे के पीछे राजनीति है। सत्ता के गलियारों में आज भी ये चर्चा आम है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपने दोस्तों-सलाहकारों के कहने पर बाबरी मस्जिद मामले में कई तरह के फैसले लिए थे। 1989 में विश्व हिंदू परिषद को अयोध्या के विवादित क्षेत्र में राम मंदिर के शिलान्यास की इजाजत उन्हीं ने दी थी। उनके इसी कदम का नतीजा हुआ कि छह दिसम्बर, 1992 को बाबरी मस्जिद को कारसेवकों ने गिरा दिया। इससे भी बड़ा विध्वंस कांग्रेस पार्टी के भीतर हुआ। मस्जिद के गिरने का साथ कांग्र्रेस का उत्तर प्रदेश में जमा-जमाया मजबूत किला भी भरभरा कर ऐसा गिरा कि 27 साल में भी न उनकी मरम्मत हो पाई और न सोनिया-राहुल या कोई दूसरा कांग्रेसी इसकी भरपाई करा पाया।

New Delhi: President Pranab Mukherjee with Vice President Hamid Ansari and Senior Congress leader Karan Singh during the release of his memoir "The Turbulent Years: 1980-96" at Rashtrapati Bhavan in New Delhi on Thursday. PTI Photo by Subhav Shukla (PTI1_28_2016_000077B)

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राजीव गांधी की गलती का खामियाजां अयोध्या आज तक भुगत रहा है। साथ ही साथ कांग्रेस भी उनका नुकसान उठा रही है। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उत्तर प्रदेश तब मुख्यमंत्री रहे वीर बहादुर सिंह के जरिए बाबरी मस्जिद के विवादित हिस्से में पूजा पाठ के लिए ताला खुलवाया। इसके बाद विश्व हिंदू परिषद को मौका मिल गया कि रामलला कैद में है। 1989 में शिलापूजन की इजाजत देकर राजीव गांधी ने विहिप के आंदोलन को और हवा दी और बीजेपी को भी मौका दे दिया। वैसे कई दिनों तक यह रहस्य ही रहा कि कोर्ट के प्रतिबंध के बावजूद अयोध्या में विवादित स्थल पर 9 सितंबर 1989 को विहिप ने शिलापूजन कैसे किया? इस रहस्य का खुलासा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब टरब्यूलेंट इयर्स 1980-96 में किया है। किताब में प्रणब मुखर्जी यूपी के तत्कालीन डीजीपी आरपी जोशी से शिलापूजन के अगले दिन हुई मुलाकात का जिक्र किया है। जोशी के हवाले से किताब में बताया गया है कि दिल्ली और लखनऊ में बैठे बड़े लोगों के कहने पर ही शिलान्यास हो पाया। नेहरु-गांधी परिवार के घोर आलोचक बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी भी कहते है कि अयोध्या विवाद के समाधान के लिए प्रयासों के लिए राजीव गांधी अगर दोबारा प्रधानमंत्री बनते, तो राम मंदिर का निर्माण हो गया होता।

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राजनीति के अपरिपक्व राजीव गांधी ने 1986 से 1989 के बीच हिंदू झुकाव का जो रास्ता अपनाया, उसने देश को विकास के मार्ग से भटका कर धर्म की राजनीति का अखाड़ा तो बना दिया, कांग्रेस की प्रासंगिकता भी खत्म करने का रास्ता तैयार कर दिया। अब राहुल भी उस राह पर चल रहा है। लेकिन उन्हें समझना होगा कि जिस निचले पायदान पर आज कांग्रेस खड़ी है वहां से उसे सत्ता के वापसी नहीं, बल्कि पार्टी को पुनर्जीवित करने पर पहले विचार करना चाहिए। अब भी राहुल गांधी उस मानसिकता से बाहर निकलते दिख नहीं रहे जिसकी शिकार कांग्रेस पिछले तीन दशकों में होती चली गई। 1985 में 425 सदस्यों वाली यूपी की विधानसभा में कांग्रेस के पास 269 सीटें थीं। 1989 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का आंकड़ा 100 सीटों के नीचे लुढ़क गया। इसके बाद 1991 में कांग्रेस को जहां 46 विधानसभा सीटों मिली, वहीं 2012 में उसकी सीटों का आंकड़ा यूपीए सरकार के दोबारा केंद्र की सत्ता में आने के बावजूद 28 सीटों पर आकर ठहर गया। जबकि 2009 के लोकसभा चुनाव में यूपी ने कांग्रेस को 23 लोकसभा सदस्य दिए थे।

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दरअसल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की बदहाली के पीछे यह अहम वजह मानी जाती है कि इस पार्टी आस्था से जुड़ी चीजें भी राजनीतिक हानि-लाभ के नजरिए से तय की जाती हैं। मसलन अगर राम के दर्शन किए तो रहीम नाराज होंगे और अगर सिर्फ रहीम की खैरियत मनाई तो राम के दरबार में खैरियत बिगड़ जाएगी। यूपी की राजनीति में इसी सोच ने कांग्रेस काफी पीछे खड़ा कर दिया है। वैसे अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक की इस राजनीति का खाका 80 के दशक में कांग्रेस नेताओं ने ही विवादित स्थल का ताला खोलकर तैयार किया था। तभी से अयोध्या का राजनीतिक संग्राम देश की सियासत का केंद्रीय मुद्दा बन गया। एक बार फिर कांग्रेस उपाध्यक्ष उसी सियासत की हांड़ी चढ़ाने की कोशिशों में जुटे हैं। जबकि राजनीति का एक सच यही है कि जनता को बार-बार आप मूर्ख नहीं बना सकते। जनता के हितों को आप भावनाओं की बाढ़ में बार-बार बहा नहीं सकते। लोगों को जब यह पता लग जाता है कि सियासत के लिए उनकी भावनाओं को छला जा रहा है या फिर जिंदगी के बुनियादी सवालों से भटकाकर उसकी पीढ़ियों को अंधेरी सुरंग की ओर ढकेला जा रहा है तो फिर हिंदू हो या मुसलमान या फिर वंचित या सम्पन्न, हर वर्ग से जुड़ी युवाओं की टोली सत्ता परिवर्तन के लिए मचलने लगती है, क्योंकि उसे मालूम होता है कि सियासत को बदले बगैर किस्मत में बदलाव मुमकिन नहीं।

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