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यूपी की शान और हॉकी के जादूगर – ‘ध्यानचंद’!

नई दिल्ली: हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को पूरा देश खेल दिवस के रूप में मना रहा है. 29 अगस्त 1905 को इलाहबाद के एक राजपूत परिवार में जन्में ध्यानचंद को बचपन में हॉकी से कोई लगाव नहीं था, लेकिन रेजीमेंट में सिपाही बनने के बाद ध्यानचंद ने हॉकी खेलना शुरू किया था. इसके बाद उन्होंने ऐसी हॉकी खेली की दुनिया उन्हें ‘जादूगर’ कहने लगी. मेजर ध्यानचंद ने अपने खेल जीवन में 1000 से अधिक गोल दागे. यूं तो ध्यानचंद के जीवन से जुड़ी कई बातें हैं, लेकिन आपको जानकर गर्व महसूस होगा कि ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना के एक स्पोर्ट्स क्लब में उनकी खास तरह की मूर्ति लगाई गई है. इस मूर्ति की खूबी है कि इसमें ध्यानचंद के चार हाथ हैं.

दरअसल, ध्यानचंद की चार हाथों वाली मूर्ति के जरिए संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि वे मैदान पर ऐसे खेलते थे मानो वे चार हाथों से खेलते हों. उनके गोल दागने की कला की दुनिया कायल थी.

National sports day 2017: वियना में रहते हैं चार हाथों वाले 'हॉकी के जादूगर' ध्यानचंद!

ध्यानचंद की उपलब्धियों का लंबा सफर

लगातार तीन ओलंपिक (1928 एम्सटर्डम, 1932 लॉस एंजेलिस और 1936 बर्लिन) में भारत को हॉकी का स्वर्ण पदक दिलाने वाले ध्यानचंद की उपलब्धियों का सफर भारतीय खेल इतिहास को गौरवान्वित करता है. उनके जीवट का हर कोई कायल रहा. उनके खेल जीवन से जुड़ा एक यादगार वाकया भारतीय हॉकी को शिखर पर ले जाता है.

बर्लिन आलंपिक के फाइनल का वो वाकया

दरअसल, बर्लिन आलंपिक के हॉकी का फाइनल भारत और जर्मनी के बीच 14 अगस्त 1936 को खेला जाना था. लेकिन उस दिन लगातार बारिश की वजह से मैच अगले दिन 15 अगस्त को खेला गया. बर्लिन के हॉकी स्टेडियम में उस दिन 40 हजार दर्शकों के बीच हिटलर भी मौजूद थे.

हाफ टाइम तक भारत एक गोल से आगे था. इसके बाद ध्यानचंद ने अपने स्पाइक वाले जूते निकाले और खाली पांव कमाल की हॉकी खेली. इसके बाद, तो भारत ने एक के बाद एक कई गोल दागे.

साथी दारा ने एक संस्मरण में ऐसा लिखा

1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनके साथ खेले और बाद में पाकिस्तान के कप्तान बने आईएनएस दारा ने एक संस्मरण में लिखा- छह गोल खाने के बाद जर्मन काफी खराब हॉकी खेलने लगे. उनके गोलकीपर टीटो वार्नहोल्ट्ज की हॉकी स्टिक ध्यानचंद के मुंह पर इतनी जोर से लगी कि उनका दांत टूट गया.

जर्मन टीम को ऐसे सिखाया सबक

प्रारंभिक उपचार के बाद ग्राउंड पर लौटने के बाद ध्यानचंद ने खिलाड़ियों को निर्देश दिए कि अब कोई गोल न मारा जाए, जर्मन खिलाड़ियों को ये बताया जाए कि गेंद पर नियंत्रण कैसे किया जाता है. इसके बाद खिलाड़ी बार-बार गेंद को जर्मनी की डी में ले जाते और फिर गेंद को बैक पास कर देते. जर्मन खिलाड़ियों की समझ में ही नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है.

उस हार का बदला चुकाया

भारत ने उस फाइनल में जर्मनी को 8-1 से मात दी. इसमें तीन गोल ध्यानचंद ने किए. दरअसल, 1936 के ओलंपिक खेल शुरू होने से पहले एक अभ्यास मैच में भारतीय टीम जर्मनी से 4-1 से हार गई थी. ध्यानचंद ने अपनी आत्मकथा ‘गोल’ में लिखा, ‘मैं जब तक जीवित रहूंगा इस हार को कभी नहीं भूलूंगा. इस हार ने हमें इतना हिला कर रख दिया कि हम पूरी रात सो नहीं पाए.’

 हिटलर को भी दू टूक, कहा- हिंदुस्तान में खुश हूं

कहा जाता है कि इस शानदार प्रदर्शन से खुश होकर हिटलर ने उन्हें खाने पर बुलाया और उनसे जर्मनी की ओर से खेलने को कहा. इसके बदले उन्हें मजबूत जर्मन सेना में कर्नल पद का प्रलोभन भी दिया. लेकिन ध्यानचंद ने कहा, ‘हिंदुस्तान मेरा वतन है और मैं वहां खुश हूं.’

FACTS-

-चूंकि ध्यान सिंह रात में बहुत अभ्यास करते थे, इसलिए उन्हें अपने साथी खिलाड़ियों द्वारा उपनाम ‘चांद’ दिया गया. दरअसल, उनका यह अभ्यास चांद के निकल आने पर शुरू होता था.

-आप यह जानकर हैरानी होगी कि मेजर ध्यानचंद को बचपन में हॉकी नहीं,  कुश्ती से ज्यादा लगाव था.

-एक बार उन्होंने कहा था- अगर किसी ने मुझसे पूछा कि वह सबसे अच्छा मैच कौन-सा था, जो मैंने खेला, तो मैं कहूंगा कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच 1933 का बेटन कप फाइनल.

-भारत ने 1932 के ओलंपिक के दौरान अमेरिका को 24-1 और जापान को 11-1 से हराया. ध्यानचंद ने उन 35 गोलों में से 12, जबकि उनके भाई रूप सिंह ने 13 गोल दागे. इससे उन्हें ‘हॉकी का जुड़वां’ कहा गया.

-एक बार जब ध्यानचंद एक मैच के दौरान गोल नहीं कर पा रहे थे, तो उन्होंने गोल पोस्ट की माप पर आपत्ति जताई. आखिरकार वे सही पाए गए. गोल पोस्ट अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत निर्धारित आधिकारिक न्यूनतम चौड़ाई का नहीं था.

-22 साल तक भारत के लिए खेले और 400 इंटरनेशनल गोल किए. कहा जाता है- जब वो खेलते थे, तो मानो गेंद स्टिक पर चिपक जाती थी. हॉलैंड में एक मैच के दौरान चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़कर देखी गई. जापान में एक मैच के दौरान उनकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात भी कही गई.

-ध्यानचंद का 3 दिसंबर, 1979 को दिल्ली में निधन हो गया. झांसी में उनका अंतिम संस्कार उसी मैदान पर किया गया, जहां वे हॉकी खेला करते थे.

dhyan chand
मेजर ध्यानचंद की फाइल तस्वीर
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