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न डेवलपमेंट एजेंडा, ना ही दमदार नेतृत्व; क्या इसलिए विकास के मुद्दों से भाग रही भाजपा

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अतिथि संपादक

उत्तर प्रदेश में चुनावी चौरस बिछने लगी है। राजनीतिक दल भी अपनी गोटियां साधने लगे हैं। ऐसा हो भी क्यों नहीं? आखिर 80 सांसदों को लोकसभा में भेजने वाला उत्तर प्रदेश केंद्र की राजनीति और सत्ता को बड़े स्तर पर प्रभावित जो करता है। दरअसल कुल 545 सीटों वाली लोकसभा के लिए यूपी और बिहार को मिलाकर 120 सांसद चुने जाते हैं। ऐसे में विभिन्न दलों की अकुलाहट देखना मजेदार हो रहा है। हाल फिलहाल में सबसे अधिक बेचैनी भारतीय जनता पार्टी में देखने को मिल रही है। भाजपा उत्तर प्रदेश की राजनीति में करीब दो दशक से बाहर है। पर, 2014 के लोकसभा में उत्तर प्रदेश में 73 सीटें जीतने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह यूपी में सरकार बनने का मंसूबा देख रहे हैं। हालांकि पार्टी के भीतर चल रहे घमासान को देखते हुए यही लग रहा है कि यूपी के विधानसभा चुनाव में भाजपा की दिल्ली और बिहार से ज्यादा स्थिति खराब होने वाली है। शायद यही वजह है कि लोकसभा के चुनाव में विकास की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले शाह और दूसरे भाजपा नेताओं की जातिवाद करने वाले सामंती सोच उबाल मारने लगी है। वह भी ऐसे दौर में जब पहली बार उत्तर प्रदेश में विकास कार्य साफ तौर दिखाई दे रहे है, जबकि विकास के नाम पर केंद्र की सत्ता हथियाने वाली भाजपा के पास अब तक अपना काम दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है।

हाल ही में अमित शाह ने यूपी के कासगंज में एक रैली के दौरान कहा कि उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही निःशुल्क लैपटॉप वितरण योजना का लाभ सिर्फ जाति विशेष के लोगों को मिला है। हालांकि अमित शाह को युवाओं ने उसी वक्त आईना दिखा दिया, जब आदत से मजबूर शाहर ने सभा की भीड़ में अपने आरोप पर हामी पाने की कोशिश की। उन्होंने लोगों से पूछा कि क्या आपको योजनाओं को लाभ मिला, भीड़ से युवाओं ने एक स्वर से ‘हां मिला’ की आवाज देकर शाह की बोलती बंद कर दी। दरअसल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मार्च 2012 में अपनी सरकार पहली ही कैबिनेट मीटिंग में फ्री लैपटॉप वितरण का फैसला ले लिया था। तब भी हताशा में कुछ दलों, खासकर बीजेपी ने इसे झुनझुना कहा तो किसी ने कागजी शेर बताया, लेकिन जैसे-जैसे इस योजना की लोकप्रियता बढ़ी, समाजवादी सरकार टॉप पर पहुंच गई और उनकी बोलती भी बंद हो गई। क्योंकि अखिलेश सरकार ने शहर ही नहीं गांव-गांव में बिना किसी भेदभाव के हर जाति, धर्म, क्षेत्र और वर्ग के होनहार छात्र-छात्राओं तक फ्री लैपटॉप पहुंचाया। क्या अमीर…. क्या गरीब…. क्या गांव… कोई भेद नहीं रहा। पूरे प्रदेश में सूचना और तकनीकी शिक्षा की ओर ऐसा रूझान हुआ कि सिर्फ छात्र-छात्राएं क्या, पूरा परिवार ही लैपटॉप के जरिए नई दुनिया से वाकिफ होने लगा। गांव की चौपाल से दूर पूरी दुनिया से उन्हें जोड़ दिया। आधार कार्ड बनवाना हो, कोई फार्म भरना हो, खसरा-खतौनी निकलवानी हो या फिर वूमन पावर लाइन 1090 में छेड़छाड़ की शिकायत करनी हो, लैपटॉप हर छात्र-छात्रा और गांव-परिवार को हमराही बन गया है। यह फ्री लैपटॉप वितरण योजना की सफलता ही थी कि तमिलनाडु सहित अन्य राज्य ने भी अपने यहां इस योजना की शुरुआत की। इतना ही नहीं भाजपा शासित हरियाण सरकार ने भी अपने वहां 95 फीसदी से अधिक अंक वाले वाले छात्र-छात्राओं को इस साल से लैपटॉप देने का निर्णय लिया है। ऐसे में अमित शाह का तंज उनकी निराशा को ही परिलक्षित करता है।

उत्तर प्रदेश की बात करें तो इस योजना के तहत अब तक करीब 15 लाख छात्र-छात्राओं को फ्री लैपटॉप बांटे जा चुके है। ऐसा नहीं है कि सरकार ने महज यूपी बोर्ड के छात्र-छात्राओं को इस योजना का लाभ दिया है बल्कि सीबीएसई, आईसीएससी, आईएससी, संस्कृत विद्यालयों के पूर्व माध्यमिक एवं मध्यमा बोर्ड, मुंशी व मौलवी अलीम ऑफ मदरसा बोर्ड और मान्यता प्राप्त आईटीआई तथा पॉलीटेक्निक कॉलेजों को भी इसमें शामिल किया गया है।

अब जरा अमित शाह या भाजपा के दलित प्रेम की बात करें। हाल ही में अमित शाह का एक दलित के घर भोजन करना सुखिर्यों में रहा, पर शाह और दूसरे भाजपा नेताओं को दलित के घर का पानी पीना गंवारा नहीं था, सो उनके लिए अलग से मिनरल वॉटर के बोलतों की व्यवस्था की गई थी। दरअसल यहां व्यवस्था में सुधार नहीं राजनीतिक लाभ पाने का शोर बड़ा था। अब जरा एक मई को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के मजदूरों के लिए 10 रुपये में भोजन की व्यवस्था वाले कार्यक्रम को याद कीजिए। क्या कोई बता सकता है कि सीएम अखिलेश के साथ भोजन करने वाले किस जाति के थे, नहीं न। यहां मकसद जनता को लाभ पहुंचना था, न कि राजनीतिक लोभ।

पिछले 15-20 सालों में उत्तर प्रदेश की राजनीतिक नदी का पानी बहुत बह चुका है। उनकी रवानी भाजपा नेता नहीं समझ पा रहे हैं। 2012 में जब अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की बागडोर दी गई तो इन दलों की बेचैनी बढ़ गई थी। चुनाव के दौरान ही जिस करिश्माई व्यक्तित्व के साथ अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के युवा चेहरे के रूप में स्थापित हुए, वैसी युवा सोच और जोश भाजपा को अपने पास अभी तक दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। पार्टी में सत्ता को लेकर लोभ इस कदर बढ़ गया है कि हर कोई मुख्यमंत्री बनने का मंसूबा पाल रहा है। गुटबाजी सतह पर आ गई है। ऐसे में भाजपा के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में बची-खुची साख बचाने के लिए जातिवाद के सामंती खेल का ही सहारा रह गया है। कभी दलित-सर्वण का खेल तो कभी ओबीसी के नाम पर दागी को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाने को खेल खेला जा रहा है। यह वजह है कि मंदिर मुद्दे को लेकर हिन्दुत्ववादी छवि के साथ कई राज्यों से लेकर केन्द्र तक में सत्तारूढ़ होने वाली भाजपा अब जातिवादी पार्टी बनने की ओर अग्रसर दिख रही है।

भाजपा की बौखलाहट की एक और वजह है कि वह एजेंडा के तहत यूपी में चुनाव लड़े। अगर आपको याद हो तो बीते लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ विकास और भ्रष्टाचार का मुद्दा लेकर ही चुनाव लड़े थे और भाजपा के 43 पन्नों के मेनिफेस्टो में राम मंदिर मुद्दा 42वें पेज पर था। पर बिहार चुनाव में गाय और साम्प्रदयिक मामलों को मुद्दा बनने वाली भाजपा को बुरी हार का सामना करना पड़ा था। उससे पहले दिल्ली के चुनाव में भी साफ हो गया कि भाजपा की बातें सिर्फ जुमलाबाजी थी, विकास तो उनके लिए बहाना था। अब यूपी की राजनीति में भी वे जनता को जाति में बांटने के खेल में जुट  गई है। जबकि भाजपा को यह समझना होगा कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार से पिछले चार वर्षों में कराए गए विकास कार्यों से यहां के पुराने राजनीतिक समीकरण मौजूदा दौर में बिल्कुल ही बदल गए है। पहले जो राज्य अपने जातिगत तानेबाने के बाद चुनावों में अलग ही समीकरण के कारण सुर्खियों में रहता था, वहां अब सीएम अखिलेश की ओर से कराए गए विकास कार्यां की ही चर्चा हो रही है। पर भाजपा के पास न तो कैडर है और न ही उत्तर प्रदेश में गिनाने के लिए कोई काम ही है। अलबत्ता सांसदों ने सुर्खियां बटोरने के लिए कुछ गांव गोद लिए थे, वो भी बदहाल हैं। उत्तर प्रदेश में दलित और ओबीसी वोटरों की संख्या करीब दो तिहाई है, ऐसे में अमित शाह और भाजपा इन्हें अपने पक्ष में भरमाने की पूरी जुगत लगा रहे हैं। लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि काठ ही हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो मौजूदा दौर में यहां के अधिकांश वोटर युवा हैं जो अखिलेश सरकार के जरिए दिए गए फ्री लैपटॉप से दुनिया जहान से भी परिचित हो रहे हैं, लेकिन उन्हें विकास और जातिवाद में फर्क साफ समझ में आता है। बहरहाल चुनाव के वक्त समीकरण जो भी हो, लेकिन यह साफ है 2014 जैसी जीत का मंसूबा पाले भाजपा की आगे की राह बहुत मुश्किल होने वाली है।

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