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जनता का भरोसा तो खो ही चुकी थीं, अब बसपा कार्यकर्ताओं का भी भरोसा खो रहीं मायावती

maya

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09 September, 2016

बसपा सुप्रीमो मायावती अपने सियासी कॅरियर के सबसे बुरे दौर से गुजर रही हैं। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं उनके तुरूप पत्ते रहे बसपा के नामचीन नेता दूसरे दलों का दामन थाम रहे हैं। अब जबकि यह साफ हो गया है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में विकास ही प्रमुख मुद्दा होगा, जाति की राजनीति करने वाली इस पार्टी के सामने मुद्दों का भी अभाव नजर आने लगा है। शायद यही वजह है कि अखिलेश सरकार में कराए गए कार्यों को वो अपनी पुरानी योजना बताकर लपकने की कोशिश कर रहे हैं। मायावती बोलती हैं कि सपा सरकार मेट्रो, एक्सप्रेस-वे जैसी तमाम विकास योजनाएं उनके समय बनी थी लेकिन तब उन पर काम नहीं हुआ। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि मायावती ने जब ये योजनाएं बनाई ही थीं तो आखिर उन पर अमल क्यों नहीं किया? बहरहाल ये गौर करने वाली बात है कि पिछले दस वर्षों में मायवती की प्रॉपर्टी 11 करोड़ रुपये से बढ़कर 111 करोड़ रुपये हो गई, जो उन्होंने चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामों में खुद स्वीकार किया है।

माया राज से हर आम और खास के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र था मुख्यमंत्री आवास

याद कीजिए वो दौर जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुखिया थीं। मुख्यमंत्री आवास हर आम और खास के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र था। बड़े-बड़ों को अन्दर जूते उतारकर ही जाने की इजाजत मिलती थी। उनके शासन में विकास के नाम पर पत्थर के पार्क, स्मारकों के नाम पर सरकारी कोष से जमकर पैसे लुटाए जा रहे थे। इन्हीं की नतीजा है कि 2012 में सत्ता गंवाने वाली मायावती की छवि आज भी वैसी ही जैसी तब थी। शायद यही वजह है कि उनके सिपहसालार एक-एक कर कुर्सी छोड़ रहे हैं। आज भी मायावती का अधिकांश समय उनके कार्यक्राल में हुए भ्रष्टाचार, तानाशाही रवैये के आरोपों का जबाव देते हुए ही गुजर जाता है। कभी ‘पत्थरों से प्रेम’ तो कभी ‘दौलत की बेटी’ जैसी उपमाओं से नवाजी जाने वाली मुख्यमंत्री मायावती के ऊपर लगातार आरोप यह भी लगते रहे कि अपने स्वार्थ के कारण उन्होंने प्रदेश के विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया। जिसका खामियाजा प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ा।

मनरेगा में सबसे ज्यादा फर्जीवाड़े के मामले यूपी में

मनरेगा जैसी केन्द्रीय योजनाओं में भ्रष्टाचार और अनाज घोटाले हो या फिर टप्पल से लेकर ग्रेटर नोएडा तक भूमि अधिग्रहण का मामला, मायवती सरकार हर मोर्चे पर विफल रही। मनरेगा में सबसे ज्यादा फर्जीवाड़े के मामले उत्तर प्रदेश में ही सामने आए थे। जबकि इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण स्तर पर जरूरतमंदों को न्यूनतम 100 दिनों का रोजगार उनके अपने ही क्षेत्र में मुहैया कराना था। ताकि उनके रोजी-रोटी की तलाश में भटकना से रोका जा सके। जबकि मायावती के कार्यकाल में जॉब कार्ड व मस्टर रोल में बड़े पैमाने पर धांधली, अपात्रों का चयन, निर्धारित दर से कम पर भुगतान करना, ग्राम प्रधान तथा जिला व ब्लाक स्तर के अधिकारियों के बीच मिलीभगत से लगभग सभी जिलों में धांधलियां हुईं। राज्य सरकार ने जो 2009-10 की वार्षिक रिपोर्ट केन्द्र सरकार को भेजी, उसके अनुसार केवल 18 करोड़ कार्य दिवस का ही सृजन हो पाया था। इसी प्रकार 57 करोड़ कार्य दिवस का पैसा अधिकारियों के पेट में चला गया। यह तो एक वर्ष का आंकड़ा था, इससे पहले 2008-09 में केन्द्र सरकार ने 5500 करोड़ रुपये और उसे पहले 4800 करोड़ रुपये दिया था। उसकी भी बन्दरबांट हो गई।

घोटालों में लिप्त रहे बसपा के कई मंत्री, नेता

माया राज में बसपा के नेताओं की कारगुजारी से भी जनता त्रस्त रही। घोटालों में लिप्त कई बसपा नेताओं को तो जेल तक की हवा खानी पड़ गई। माया सरकार के दो दिग्गज मंत्रियों नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाह के बीच तो घोटालों की प्रतियोगिता जैसी छिड़ गई थी। प्रतिस्पर्धा का पानी जब सिर से उपर हुआ तो पहले बाबू सिंह कुशवाहा को अपनी लाल बत्ती तक गंवानी पड़ गई, फिर जेल की हवा खानी पड़ी। बाबू सिंह कुशवाहा की बाद में बसपा से रूख्सती हुई तो उन्होंने भाजपा का दामन थामा, पर जब भाजपा की थू-थू हुई तो बड़ी बेअदबी से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। जमीन की लड़ाई में माया सरकार के मंत्री नंद गोपाल नंदी पर जानलेवा हमला हुआ तो प्रदेश की कानून व्यवस्था पर भी सवालिया निशान उठाने लगे। बरेली और मेरठ सहित कई शहर साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलसे, तो थानों में रेप के मामले भी सामने आए।

बुन्देलखंड में 10 करोड़ पेड़ लगाने का दावा किया, लगाए एक भी नहीं

मायावती के शासनकाल में वर्ष 2009-10 में 1600 करोड़ रुपये खर्च करके महीने भर के भीतर बुन्देलखंड में 10 करोड़ पेड़ लगाने का दावा किया गया। केन्द्रीय रोजगार गारन्टी परिषद के सदस्य संजय दीक्षित ने केन्द्रीय टीम के साथ इसकी जांच की तो वहां एक भी पेड़ नहीं मिला। इसके बावजूद इस मामले में एक भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, क्योंकि मामला वनमंत्री से सीधे जुड़ा हुआ था।

धरना-प्रदर्शन पर रोक का तुगलकी फरमान

लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन जनता का अधिकार होता हैं। लेकिन मायावती ने अपनी सरकार के खिलाफ उठने वाली किसी भी आवाज को दबाने के लिए धरना-प्रदर्शन तक पर रोक लगाने की कोशिश में जुट गई थीं। माया सरकार ने एक तुगलकी आदेश जारी करके कहा कोई भी दल या संगठन तब तक धरना-प्रदर्शन नहीं कर सकता है जब तक कि प्रशासन से इसकी इजाजत नहीं ले ली जाती। विपक्षी दलों ने इस कदम को अघोषित आपातकाल की संज्ञा दी। मायावती सरकार को कई बार अपनी कारगुजारियों के चलते कोर्ट की फटकार भी पड़ी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बसपा सुप्रीमो की मंशा को धता बुलाते हुए उनकी सरकार द्वारा नगर निकाय चुनाव एक्ट में किए गए संशोधन को अवैध करार दिया। मायवती चाहती थी कि नगर निकाय चुनाव पार्टी के सिम्बल के बगैर लड़े जाएं। इसके पीछे उनका एक डर था कि अगर सिंबल पर चुनाव हुए तो उनकी पार्टी को मुंह की खानी पड़ सकती है।

जनता के पसीने की कमाई को पत्थरों पर लगाया

बसपा सरकार में किसानों के हित में उठाए गए कदमों की बात करें तो 2007 से 2012 तक उत्तर प्रदेश के किसानों की दशा में कोई सुधार नहीं आया। किसानों की जमीनें अमीरों को लुभाती रहीं तो प्रदेश सरकार अक्सर अमीरों के साथ खड़ी दिखी। मायावती की कार्यशैली पर नजर दौड़ाई जाए तो भी निराशा ही दिखाई देती है। उनके कार्यकाल में विकास के मामले में उत्तर प्रदेश पिछड़ता गया। विभिन्न घोटालों और भ्रष्टाचार की फेहरिस्त से उत्तर प्रदेश की देश-विदेशों में बदनामी भी होती रही। खुद को दलितों की सबसे बड़ी पैरोकार बताने वाली मायावती ने जहां अपने दलित पुरोधाओं की पत्थर की कीमती मूर्तियों को नक्काशीदार पार्कों में लगाकर आम जनता के पसीने की कमाई को पानी की तरह बहाया। वहीं अलग से बडे़ क्षेत्रफल में कांशीराम स्मारक स्थल बनवाने के लिए ऐतिहासिक जेल और काॅलोनी को गिराने में कोई संकोच नहीं दिखाया। दूसरी तरफ पार्टी फंड जुटाने के लिए उनकी सरकार के ही कुछ विश्वासपात्र नेता उद्योगपतियों, व्यापारियों के मेलजोल बढ़ाते दिखे।

महिला आरक्षण विधेयक का विरोध किया

महिला मुख्यमंत्री होने के बादवजूद जब महिलाओं के हित की बात आई तब भी मायावती का अलग ही स्टैंड सामने आया। लोकसभा में उनकी पार्टी ने महिला आरक्षण विधेयक का विरोध किया। महिला आरक्षण पर जब उन्हें लगा कि नुकसान हो सकता है तो वह कोटे में कोटे की बात करने लगीं। मायावती के कुछ अहम फैसलों पर नजर दौड़ाई जाए तो साफ हो जाएगा कि उनके अधिकांश फैसले वोट बैंक को ध्यान में रखकर लिए जाते रहे।

धन इकट्ठा करने से कभी गुरेज नहीं किया

वहीं आय से अधिक संपत्ति के मामले में कोर्ट में मामला होने के बावजूद उन्हें धन इकट्ठा करने से भी कभी गुरेज नहीं रहा। बसपा की 25 वीं वर्षगांठ के मौके पर माया ने हजार रुपये के नोटों की करीब सात मीटर लम्बी और दो फुट मोटी माला धारण की। इस माला की कीमत करोड़ों रुपये बताई गई। दरअसल 2007 में पूर्ण बहुमत मिलने कारण मायावती सरकार पूरी तरह से निरंकुश हो गई थी। जिनको जेल में होना चाहिए उन माफियाओं के लिए बसपा के दरवाजे खुल गए। माया अपराधियों को गरीबों का मसीहा बताने लगी। जिन गुंडे-बदमाशों को चुनाव प्रचार के दौरान वह जेल की सलाखों के पीछे डाल देने की बात करती थीं, वह उनके बगलगीर हो गए। कई को लाल बत्ती मिल गई। जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम करने लगी थी, लेकिन माया पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

हाल-फिलहाल की स्थिति को देखें तो भी ऐसा नहीं लगता है कि मायावती ने अपनी पुरानी गलतियों से कोई सबक सीखा है। कमोबेश यही हाल अब भाजपा का दिख रहा है। पहले बसपा के जो नेता उन्हें भ्रष्ट दिखते थे, भाजपा में आते ही उन्हें अब वे ईमानदार नजर आने लगे हैं। राजनीति में एक बात प्रचलित है कि कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता है, लेकिन ऐसी दोस्ती भी क्या भली जब प्रदेश और प्रदेश की जनता का ही भला न हो।

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