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कामधेनु योजनाओं ने बदली उत्तर प्रदेश की तस्वीर

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05 August, 2016

आज आपको एक कहानी बताता हूं। …एक जंगल में जानवरों के बीच प्रतियोगिता हुई। शर्त थी कि जो जानवर सबसे पहले जंगल के पास स्थित पहाड़ की चोटी पर पहुंचेगा, उसे पुरस्कृत किया जाएगा। उसमें शेर, बंदर, जिराफ, हाथी, लोमड़ी आदि सभी ने भाग लिया। प्रतियोगिता में मेंढ़कों का एक झुंड भी था। प्रतियोगिता शुरू होते ही जानवर मेंढ़कों का मजाक उड़ाने लगे। देखना थोड़ी देर फुदकने पर ही इनकी जान निकल जाएगी। ऊपर क्या खाक चढ़ेंगे? अभी जानवर कुछ दूर ही चले थे कि एक जानवर बोला- हे भगवान! पहाड़ तो बहुत ऊंचा है, इस पर चढ़ना मुश्किल है? कई जानवरों ने उसकी हां में हां मिलाई और वहीं रुक गए। बाकी आगे बढ़े। कुछ समय बाद फिर आवाज आई, मेरा तो पैर दर्द कर रहा है। इसके बाद कई अन्य जानवर वहीं से लौट गए। इस तरह समय गुजरता गया, जानवर कम होते गए। अंत में चोटी पर केवल एक मेंढक पहुंचा। यह देख कर सभी जानवरों को बेहद शर्मिंदगी हुई। उन्होंने उसी झुंड के एक मेंढक से पूछा- यार! ये बताओ, तुम्हारा दोस्त चोटी पर कैसे पहुंच गया? मेंढक मुस्कराते हुए बोला- मैंने तुम लेागों की बात पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि लक्ष्य तय किया और आगे बढ़ता गया।
किसी महान विचारक ने भी कहा है, यदि आपमें नकारात्मकता है तो आप हर अवसर में मुश्किल देखेंगे, और यदि सकारात्मकता है तो आप हर मुश्किल में अवसर देखेंगे। ये हमें तय करना है कि क्या हम नकारात्मक माहौल में उस मेंढक की तरह बन सकते हैं? यदि हां, तो हमें अपने उद्देश्य की चोटी पर पहुंचने से कोई ताकत नहीं रोक सकता।

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ठीक यही हाल आज के उत्तर प्रदेश का है। चार साल पहले जिस हालात में अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश की बागडोर मिली थीं, तब उनके सामने नए उत्तर प्रदेश के निर्माण की चुनौतियों भी अपार थीं। तब विपक्षी दल और विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक शाखाओं से भी विरोध और आलोचना के स्वर सामने आ रहे थे। इन सबसे बेपरवाह अखिलेश यादव नए और विकासशील उत्तर प्रदेश के अपने ध्येय पर अग्रसर थे। नतीजा आज पूरा देश देख रहा है। कभी पिछड़े राज्यों में गिना जाने वाला उत्तर प्रदेश आज निवेशकों, उद्यमियों की पहली पसंद है तो गांव-किसान खुशहाल हो रहे हैं। शहरों में अवस्थापना सुविधाएं बढ़ रही हैं। विकास आज उत्तर प्रदेश की नई पहचान बन गया है।

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इन उपलब्धियों में दूध और डेयरी उद्योग का महत्वपूर्ण योगदान है। आज दूध और डेयरी के उत्पादन में उत्तर प्रदेश नंबर 1 है। दरअसल वर्षों से कहा जाता रहा है कि देश के विकास की राह गांव के खेत-खलिहानों से होकर गुजरती है। ऐसे में स्वस्थ और दुधारु पशुओं के बिना यह सोचना कोरी कल्पना है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश सरकार दुधारु पशुओं के पालन को बढ़ावा देने के लिए कामधेनु योजना संचालित कर रही है। पशुओं की उन्नत नस्ल के लिए कृत्रिम गर्भाधान से लेकर प्रजनन पर पशुपालन विभाग जोर देर रहा है। इससे ग्रामीण परिवेश के कमजोर तबकों को जहां आर्थिक स्वावलंबन मिल रहा है, वहीं रोजगार के अवसर भी मुहैया करा रहा है। नतीजतन आज यह विकसित उद्योग का रूप ले चुका है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक संरचना तेजी से मजबूत हो रही है। आधुनिक तकनीकों से लैस हो चुके इस व्यवसाय ने युवाओं को तेजी से अपनी ओर खींचा है। इससे किसानों में पशुओं के पालने को लेकर भी नजरिया बदला है। यूपी में हर साल 241.939 लाख मीट्रिक टन से अधिक दुग्ध का उत्पादन हो रहा है।

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पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता है। पशुपालन को बढ़ावा देने और श्वेत क्रांति के उद्देश्य से यूपी सरकार की कामधेनु डेयरी योजना की लागत एक करोड़ 20 लाख 91 हजार रुपये की है। यह 100 मवेशी दुधारू पशुओं को रखने की योजना है। इसमें लाभार्थी को 25 प्रतिशत मार्जिन मनी लगभग 30 लाख 13 हजार स्वयं लगाना होता है। शेष 75 प्रतिशत राशि 90 लाख 38 हजार रुपये बैंक से ऋण स्वीकृत करा सकते हैं। मिनी कामधेनु डेयरी योजना में 50 पशुओं को रखने की व्यवस्था है। इसकी लागत 52 लाख 35 हजार रुपये है। इसमें लाभार्थी को 25 प्रतिशत मार्जिन मनी लगभग 13 लाख 9 हजार रुपये स्वयं लगाना है। शेष 75 प्रतिशत बैंक से ले सकते हैं। एक माइक्रो कामधेनु योजना भी है। इसमें 25 मवेशी रखने की व्यवस्था है। इसमें लाभार्थी को 26 लाख रुपये मिलते हैं। इस तरह किसान खेती के साथ कामधेनु योजनाओं के जरिए डेयरी कारोबार को अपना कर आप अपनी आय में चार चांद लगा सकते हैं।

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अखिलेश सरकार की इस योजना से पूरे उत्तर प्रदेश की तस्वीर बदल रही है। इस योजना के तहत दुधारू गायों में संकर जर्सी, संकर एचएफ अथवा साहीवाल प्रजाति की गाय तथा भैंसों में मात्र मुर्रा प्रजाति की भैंस ही रखी जा रही है। ये गांयें न केवल अधिक दूध देती हैं, बल्कि इससे प्रदेश में उच्च कोटि की दुग्ध उत्पादक पशुओं की नई वरायटी भी तैयार हो रही है। 100 दुधारू पशुओं की एक यूनिट स्थापित करने हेतु पशुपालक अपनी सुविधानुसार यह स्वयं निर्णय ले सकेगा कि यूनिट में सभी गाय अथवा भैंसें रखनी है या गायें एवं भैंसें दोनों कितनी-कितनी संख्या में रखनी है। हालांकि इकाई में गोवंश एक ही प्रजाति का होना अनिवार्य किया गया है।

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दूसरी ओर यूपी सरकार ने 2500 मिनी कामधेनु डेयरी इकाइयों की स्थापना का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके तहत पूरे प्रदेश में उच्च उत्पादन क्षमता के पशुओं की उपलब्धता एवं उत्पादन सुनिश्चित करना है। इस योजना से छोटे एवं मध्यम पशुपालकों को काफी फायदा हुआ है। कामधेनु योजना से जोडने के लिए मिनी कामधेनु योजना ली गयी है। इसके तहत प्रदेश में 50 दुधारू गाय या भैंसों की डेयरी इकाइयां स्थापित की जा रही हैं। कामधेनु डेयरी योजना की तहत ही इसके तहत भी 50 दुधारू पशुओं की एक यूनिट स्थापित करने का नियम है। इसमें पशुपालक अपनी सुविधानुसार यह स्वयं निर्धारित करेगा कि उसे यूनिट में सभी गाय रखनी है या भैंसें।

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योजना के मुताबिक, एक इकाई की कुल लागत 52.35 लाख रुपए है, जिसमें 50 दुधारू पशुओं का क्रय, पशु गृह एवं भूसा गोदाम आदि का निर्माण सम्मिलित है। यूनिट की पूरी लागत की 25 फीसदी धनराशि 13.09 लाख रुपए लाभार्थी को स्वयं लगानी होगी एवं 75 फीसदी धनराशि 39.26 लाख रुपए बैंक ऋ ण के माध्यम से प्राप्त की जा सकेगी। योजना लागत के 75 फीसदी पर या लाभार्थी द्वारा बैंक से प्राप्त ऋण पर जो भी कम हो 12 फीसदी ब्याज की दर से अधिकतम 14.14 लाख रुपए की धनराशि की प्रतिपूर्ति 5 वर्षों (60 माह) तक प्रदेश सरकार द्वारा की जायेगी।
यह तो विकास का एक पहलू है। अकेले पशुधन को बढ़ावा देने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है। इससे आय के साथ रोगजार के साधन भी सृजित हो रहे हैं। निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश की तरक्की में ऐसे छोटे-छोटे, लेकिन महत्वपूर्ण योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बधाई के पात्र हैं।

 

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