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कैराना को बदनाम करने की साजिश नाकाम, पर सामने आ गई बीजेपी की हताशा

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सरहदों पर बहुत तनाव है क्या

कुछ पता करो चुनाव है क्या

खौफ़ बिखरा है दोनों सम्तों में

तीसरी सम्त का दबाव है क्या

राहत इंदौरी का यह शेर आज की राजनीति पर भी प्रासंगिक है। कैराना के प्रकरण पर भी सटीक बैठता है। यह वही कैराना है, जो तब भी खामोश था जब मुजफ्फरनगर दंगों की आग में झुलस रहा था। सहारनपुर और कांठ में आग लगी तो भी चुप रहा। अलबत्ता यहां से उपजे किराना घराने की सुरों की हवा से देश-विदेश रोमांचित होते रहे हैं पर, राजनीति का ऐसा वायरल फैला कि कैराना हैरान है, स्तब्ध है। वैसे सुना ये भी जा रहा  है कि यूपी में चुनाव है। इसलिए कैराना के बहाने यूपी के दो सम्प्रदायों के बीच तनाव का कुचक्र रचा जा रहा है, जैसा 2014 के चुनाव में मुजफ्फनगर और सहारनपुर में रचा गया था।

सबसे पहले जानते हैं उस दुस्प्रचार के बारे में जो कैराना को लेकर गढ़ा गया। बेहद समृद्ध गन्ना बेल्ट के बीच में स्थित शामली जिले का एक छोटा सा कस्बा है कैराना। भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद हुकुम सिंह ने हाल ही में एक सूची जारी की है, जिसमें कहा गया है कि एक विशेष समुदाय के सदस्यों के डर के चलते क्षेत्र के 346 हिंदू  परिवारों को शहर से पलायन करना पड़ा है। यहां तीन बातें विचारणीय हैं। पहली बात कि हुकुम सिंह मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपियों में से एक हैं। दूसरी बात, वे इन दिनों अपनी बेटी को राजनीति में पिछले दरवाजे से घुसाने की फिराक में हैं और तीसरी एवं महत्वपूर्ण बात यह कि आपताकाल के दौरान कांग्रेस में रहे हुकुम सिंह इन दिनों भाजपा में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने हुकुम सिंह के बयान के बाद कैराना को कश्मीर से जोड़ दिया। जबकि अब खुद ही हुकुम सिंह अपने दावे से पलट चुके हैं। वैसे कैराना का इतिहास जानकर आप खुद-ब-खुद यह पता लगा सकते हैं कि वह महज एक कस्बा नहीं है, बल्कि पूरा भारत वहां बसता है। दरअसल कैराना, भारत के ऐतिहासिक जगहों में से एक है। कैराना की हवाओं में जहां एक तरफ संगीत की मधुर लहरें तरंगित होती हैं, वहीं उसकी मिट्टी में नृत्य कला की छाप है।

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह क्षेत्र भारतीय शास्त्रीय संगीत के मशहूर किराना घराना के लिए जाना जाता था। जिसकी स्थापना महान शास्त्रीय गायक अब्दुल करीम खां ने की थी। कहा जाता है कि एक बार महान संगीतकार मन्ना डे को वहां जाना हुआ तो कैराना की मिट्टी में पांव रखने से पहले उन्होंने अपने जूता उतार कर हाथ में रख लिए थे। भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी भी कैराना घराने के गायक हैं। अगर धर्म की दृष्टि से देखा जाए तो भी कैराना एक संगम से कम नहीं है। क्योंकि यहां मशहूर ईदगाह, ऐतिहासिक देवी मंदिर, जैन बाग, बारादरी नवाब तालाब आज भी मौजूद है।

पर अचानक से यहां की पाक वादियों में साजिश की बू फैलती नजर आने लगी। लगा कि पूरे कैराने से हिन्दू पलायन कर रहे हैं। पर प्याज की मानिंद साजिश की परते उघड़ती गईं तो तमाम सवालों का जबाव भी सामने आया कि यह सब कुछ राजनीति से प्रेरित था। धु्रवीकरण करने की साजिश थी, क्योंकि पलायन की वजह खौफ नहीं, बल्कि बेहतरी की उम्मीद थी और इसमें सिर्फ हिन्दू नहीं, बल्कि मुस्लिम आबादी भी शामिल थी।

गौर करने वाली बात ये है कि रोजगार की तलाश में ऐसा माइग्रेशन पूरे भारत भर में हो रहा है। तो फिर भाजपा क्यों गढ़ रही थी यह कहानी? इस का भी जवाब साफ है। 2017 में उत्तर प्रदेश में सत्ता का जंग लड़ा जाएगा। भाजपा 2002 के बाद से उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर है। जनाधार का कुछ पता नहीं है, कैडर है नहीं। ऐसे में बची-खुची साख बचाने के लिए सांप्रदायिक धु्रवीकरण का सहारा लिया जा रहा है।

जैसा कि पहले ही साफ कर चुका हूं कि कैराना में सांप्रदायिक संघर्ष या तनाव का कोई इतिहास नहीं रहा है। सिर्फ मुस्लिम बहुल आबादी होने के कारण भाजपा इसे बेवजह मुद्दा बनाकर राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रही है।

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कृषि जागरण मंच के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश योजना आयोग के सदस्य प्रोफेसर सुधीर पंवार कहते हैं, ‘‘कैराना हमेशा से शांतिपूर्ण रहा है। यहां तक कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद जब पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर दंगे फैले हुए थे, कैराना में कुछ नहीं हुआ। 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान भी, जब शामली के कुछ क्षेत्र इसकी चपेट में आ गए थे, कैराना बिल्कुल शांत था।’’  दूसरी ओर, शामली के एसपी विजय भूषण और जिलाधिकारी सुजीत कुमार द्वारा संयुक्त रूप से सहारनपुर रेंज के डीआईजी को भेजी गई एक रिपोर्ट भी बताती है कि कैसे जब पूरा राज्य दंगों की आग में झुलस रहा था तब भी कैराना पूरी तरह से शांतिपूर्ण था। रिपोर्ट कहती है, 2013 में जब नजदीकी शहर शामली सांप्रदायिक हिंसा से जल रहा था तब हिंसा के पीड़ितों ने कैराना में शरण ली थी। जब इन शरणार्थियों ने क्षेत्र का सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश की तो वह कैराना के स्थानीय निवासी ही थे जिन्होंने सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने में पुलिस और प्रशासन का सहयोग किया।

हुकम सिंह की सूची की बात करें तो इसके फर्जी होने की बात अब सार्वजनिक हो चुकी है। पुलिस और जिला प्रशासन ने हुकुम सिंह द्वारा सूचीबद्ध किए गए 346 परिवारों में से 119 की जांच की जा चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार सूचिबद्ध लोगों में से 4 की मौत हो चुकी है और 13 लोग अभी भी कैराना में ही रह रहे हैं। 68 परिवारों को कैराना छोड़े कम से कम 5 और अधिकतम 15 साल हो चुके हैं। इनके कैराना छोड़ने की वजहें भी सांप्रदायिक न होकर बेहतर व्यापार, रोजगार, स्वास्थ्य या फिर अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा-दीक्षा रही है, लेकिन उनके घरों और दुकानों जैसी पैतृक संपत्तियों पर अभी भी उनका ही हक है। बिल्कुल इन्हीं वजहों से कुछ मुसलमान परिवार भी इलाके से पलायन कर चुके हैं। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने पर तमाम छीछालेदर के बाद अब हुकुम सिंह भी दबी जुबान अपनी गलती मानने लगे हैं। स्पष्ट है कि हुकुम सिंह और भाजपा जिस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश में थी, वह अब नाकाम हो चुकी है।

इससे पहले भी 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से पहले कुछ स्थानीय भाजपा नेताओं ने एक ऐसे वीडियो वायरल किया था, जिसके जरिये जनता को भड़काने की कोशिश की जा रही थी। बाद में पता चला कि वह वीडियो पाकिस्तान की किसी घटना से संबंधित था।

 

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