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जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप – जोश, जज्बे, जुनून से बढ़कर है भारत की जीत की कहानी

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19 December 2016

खचाखच भरे लखनऊ के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में गूंजते ‘इंडिया-इंडिया’ के नाद के बीच भारतीय हॉकी टीम के जूनियर खिलाड़ियों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। बेल्जियम को 2-1 से हराकर जूनियर हॉकी विश्व कप जीतकर उन्होंने इतिहास के पन्नों में नाम दर्ज करा लिया। जिसने भी यह मैच देखा, वह शायद बरसों तक इस अनुभव को भुला नहीं सकेगा। इस जीत के बाद मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में हर तरफ भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था। कहीं आंसू के रूप में तो कहीं मुस्कुराहटों के बीच। कोच हरेंद्र सिंह अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख सके। वहीँ कप्तान हरजीत सिंह की अगुवाई में भारतीय खिलाड़ियों ने मैदान पर भांगड़ा शुरू कर दिया तो उनके साथ दर्शक भी झूम उठे।

भारत 15 साल बाद जूनियर हॉकी विश्व कप का विजेता बना है। साथ ही यह पहला मेजबान देश है, जिसने यह खिताब अपनी सरजमीं पर जीता है। मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में तिरंगे व ट्रॉफी के साथ चक्‍कर लगा रहे इस खिलाड़ियों के लिए यह जीत स्वाभाविक रूप से बहुत बड़ी थी, लेकिन इस जीत में खिलाड़ियों के जोश, जज्बे, जुनून से बढ़कर उनका जीवन संघर्ष इस जीत को और बड़ा बना देता है।

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नि:संदेह जीत में खिलाड़ियों का बहुत योगदान होता है, लेकिन सरकारों के लिए भी ये उतना ही जरूरी है कि ऐसे गुदड़ी के लालों को पहचाना जाए और इनकी प्रतिभाओं को निखरने के मौके दिए जाएँ। शुक्र है  उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव खेलों और खिलाड़ियों को जबरदस्त प्रोत्साहन दे रहे हैं। जूनियर हॉकी विश्व कप का लखनऊ में आयोजन होना भी इसका जीवंत उदाहरण है। पिछले कुछ वर्षों से हॉकी के खेल में आफी बदलाव आये हैं। खुले मैदान की जगह एस्ट्रोटर्फ फील्ड पर खेला जाने लगा है। इसलिए हॉकी खिलाड़ियों में हुनर के साथ ताकत भी बेहद अहम् हो गयी है। लेकिन एस्ट्रोटर्फ फील्ड नहीं होने से पहले यूपी के हॉकी खिलाड़ियों को इससे परेशानी उठानी पड़ रही थी। अखिलेश सरकार ने हॉकी खिलाड़ियों की इस जरूरत को पहचाना और अब प्रदेश के तमाम स्पोर्ट्स कॉलेज में एस्ट्रोटर्फ फील्ड विकसित किये जा चुके हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि अखिलेश सरकार के प्रोत्साहन से आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश से भी विश्व चैम्पियन खिलाड़ियों की खेप तैयार होगी।

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बहरहाल आज यहाँ हम बात करेंगे इन चैंपियंस के संघर्ष के बारे में। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार भारत की 15 सदस्यीय टीम के कुल सात खिलाड़ी पेशेवर ड्राइवरों के बेटे हैं। इन खिलाडि़यों में डिफेंडर हरमनप्रीत सिंह, वरूण कुमार, गोलकीपर विकास ‍दहिया, कृष्णबहादुर पाठक, सेंटर हाफ हरजीतसिंह, मिडफील्डर सुमित कुमार और फॉरवर्ड अजित कुमार पांडे शामिल हैं।

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टीम के ड्रेग फ्लिकर हरमनप्रीत सिंह अपनी हार्ड हिटिंग के लिए जाने जाते हैं और उनका मानना है कि घंटों अपने पिता सरबजीत का ट्रेक्टर चलाने की वजह से उनके हाथों में इनकी ताकत आ गई। एक बच्‍चे के रूप में हरमनप्रीत ट्रेक्‍टर के दीवाने थे। वे पिता के साथ बैठकर इसे चलाया करते थे लेकिन गियर बदलने में उन्‍हें काफी परेशानी होती थी। बकौल हरमनप्रीत सिंह, मेरे पिता मुझे बताया करते थे कि ट्रेक्‍टर कैसे चलाते हैं, गियर बदला सबसे कठिन होता था।‘ समय बदलने के साथ वे यह ट्रिक सीख गए लेकिन इससे उनके कंधे और बाजू मजबूत हो गए। जीत के बाद पूरे मैच में डिफेंस को नियंत्रण में रखने वाले हरमनप्रीत सिंह अपने कदमों पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे थे, उन्होंने फील्ड पर जमकर भांगड़ा किया।

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गोलकीपर विकास दहिया के चमत्कारिक प्रदर्शन की वजह से भारत ने जूनियर विश्व कप के सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया को पहली बार हराने में सफलता प्राप्त की थी। विकास दहिया के पिता दलबीर दिल्ली के आजादपुर में एक फैक्ट्री में ट्रक ड्राइवर हैं, जबकि वरूण के पिता ब्रम्हानंद पंजाब के मिठापुर गांव में मेटाडोर 407 चलाते हैं।

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बैकअप गोलकीपर कृष्ण बहादुर पाठक के पिता टेक बहादुर क्रेन ऑपरेटर थे, जिनका पिछले वर्ष निधन हो गया। कृष्‍ण अपने पिता के अंतिम संस्‍कार में शामिल नहीं हो पाए थे, क्‍योंकि उस समय टीम के साथ इंग्‍लैंड दौरे पर जा रहे थे। उनके पिता का कुछ दिन पहले निधन हो गया था। मिडफील्‍डर सुमित कुमार के पिता रामजी प्रसाद वाराणसी में ड्राइवर हैं। सुमित ने स्‍पेन पर जीत में अहम भूमिका निभार्इ थी।

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‘कड़क चाय’ के नाम से मशहूर हरजीत सिंह इस टीम के कप्तान हैं। ट्रक ड्राइवर रामपाल सिंह के बेटे हरजीत सिंह जूनियर भारतीय टीम के सेंटर हाफ हैं। हरजीत का मैदान में तो ठीक, मैदान के बाहर भी योगदान रहता है। हरजीत ने ‍अपने पिता से अदरक वाली चाय बनानी सीखी और वे इसकी ताजगी से समय-समय अपने साथी खिलाडि़यों और कोचेस तथा ट्रेनर्स की थकान को मिटाते हैं।

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फॉरवर्ड अजित कुमार के पिता उत्तरप्रदेश के गाजीपुर में ड्राइविंग पेशे से जुड़े हैं। अजीत कुमार के हॉकी में आने की रोचक कहानी है। उनके पिता जय प्रकाश स्‍थानीय कारोबारी तेज बहादुर सिंह के यहां काम करते थे। गाजीपुर में रहने वाले तेज बहादुर खेलों के शौकीन हैं। इसलिए उन्‍होंने एक स्‍कूल में हॉकी एकेडमी शुरू की। इसके लिए उन्‍होंने आर्टिफिशियल टर्फ बनवाया और हॉकी स्टिक भी मुहैया कराईं। उस समय अजीत कुमार स्‍कूल में पढ़ते थे लेकिन तब उनकी हॉकी में रुचि नहीं थी। हालांकि तेज बहादुर से बातचीत के बाद उनका रूख बदल गया। अजीत ने बताया, ‘एक ट्रिप के दौरान भैया (तेजबहादुर) ने मेरे पिता से कहा कि मुझे हॉकी एकेडमी से जुड़ना चाहिए। अगली सुबह मैं हॉकी पिच पर दौड़ लगा रहा था।‘

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इस सबके साथ टीम के कोच हरेंद्र सिंह के संघर्ष इस खिलाड़ियों से भी अलग था। जीत के बाद हरेंद्र सिंह भावुक हो गए और उनके आंसू निकल आए। 11 साल पहले जब वे कोच थे उस समय टीम रोटरडम में कांस्‍य पदक का मुकाबला हार गई थी। इसका दर्द उनके दिल में जिंदा था। 16 साल के कोचिंग कॅरियर में अपने जुनून और जज्बे के लिये मशहूर रहे हरेंद्र ने दो बरस पहले जब फिर जूनियर टीम की कमान संभाली, तभी से इस खिताब की तैयारी में जुट गए थे। टीम इंडिया के फाइनल में प्रवेश के बाद जब हरेंद्र सिंह से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘यह मेरे अपने जख्म है और मैं टीम के साथ इसे नहीं बांटता। मैंने खिलाड़ियों को इतना ही कहा था कि हमें पदक जीतना है, रंग आप तय कर लो। मैंने अपने आप से वादा किया था कि हो सकता है मैं एक ओलंपियन नहीं बन सकता लेकिन मैं ओलंपियंस और वर्ल्‍ड चैंपियंस तैयार करूंगा जिन पर देश गर्व करेगा।’

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