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पीएम मोदी की नोटबंदी से कैसे बदल रही आम जनता की जिंदगी, पढ़ें यहां

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29 November 2016

केंद्र की मोदी सरकार (Modi Government) के अचानक लिए फैसले के बाद देश में 500 और 1000 के नोट प्रतिबंधित हो गए हैं। सरकार का दावा है कि इस फ़ैसले से कालाधन और भ्रष्टाचार दूर करने और आतंकी गतिविधियों पर लगाम कसने में मदद मिलेगी। लेकिन बिना ठोस तैयारी के उठाए गए इस कदम से देश की जनता, खासकर कम आय वाले लोग, व्यापारी और बचत करने वाले साधारण लोग बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) सरकार के इस फैसले से बैंकों के बाहर भगदड़ की स्थिति है। एटीएम के बाहर काम-धंधे छोड़कर जुटे लोगों की किलोमीटर लम्बी कतारें लग रही हैं। ये या तो रद्द होने वाले नोटों को बदलवाने के लिए पहुंच रहे हैं या फिर आजीविका चलाने के लिए पैसे निकालने के लिए धक्के खाने को मजबूर हैं। मोदी सरकार (Modi Government) को लगता है कि इस फ़ैसले से अरबों डॉलर की बेहिसाब रकम को अर्थव्यवस्था से खींचा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) इसे कालाधन के खिलाफ कड़वी दवा बताते हैं, लेकिन विशेषज्ञों को अंदेशा है कि कहीं ये कड़वी दवा का साइड इफेक्ट मर्ज ठीक करने के बजाय हमारी अर्थव्यवस्था को बीमार न बना दे।

नोटबंदी (Demonetisation) कोई नई बात नहीं है। भारत सहित दुनिया के कई देशों में पहले भी ऐसे कदम उठाए जा चुके हैं। पूर्व सोवियत यूनियन में मिखाइल गोर्बाचेव ने 1991 में काले धन पर अंकुश लगाने के लिए 100 और 50 के रूबल (रूसी करेंसी) को बंद कर दिया था। ये नोट वहां कुल परिचालित करंसी का एक-तिहाई हिस्सा थे। फिर भी तत्कालीन सोवियत सरकार के इस कदम से मुद्रास्फीति (inflation) पर अंकुश नहीं लग पाया और सोवियत यूनियन की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। 1987 में म्यांमार में सत्तारूढ़ सैन्य शासकों ने 80 प्रतिशत करंसी को निष्प्रभावी कर दिया था। इस कदम से वहां भी अफरा-तफरी मच गई और व्यापक जनाक्रोश फैल गया। उत्तर कोरिया, दक्षिण अफ्रीका, घाना सहित कई अन्य देश भी नोटबंदी (Demonetisation) का कड़वा अनुभव झेल चुके हैं। जबकि  इन सभी देशों में से कोई भी भारत की तरह स्थिर नहीं था और न ही हमारी तरह उनकी अर्थव्यवस्थाएं तेजी से विकास कर रही।

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1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने 1000 रुपये के नोटों को चलन से हटा दिया था। लेकिन तब इससे 2 प्रतिशत से भी कम आबादी प्रभावित हुई थी, क्योंकि उन दिनों 1000 रुपये के नोट ज्यादा प्रचलन में नहीं थे। तब मुश्किल से ही कोई ऐसा आदमी मिलता था, जिसने 1000 रुपये का नोट देखा हो। लेकिन जैसी उम्मीद थी, उसके विपरीत उस फैसले का काली अर्थव्यवस्था पर बेहद मामूली असर पड़ा। अलबत्ता भ्रष्टाचार बढ़ता ही रहा।

इस परिपेक्ष में देखा जाये तो मोदी सरकार का ये कदम अव्यावहारिक और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचा सकता है। दरअसल विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में काले धन का कारोबार हमारी सफेद अर्थव्यवस्था में गुंथा बसा हुआ है। ऐसे में नोटबंदी (Demonetisation) जैसे उपायों से कालाधन, भ्रष्टाचार पर कम आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों पर ज्यादा असर पड़ेगा।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) की यह अपेक्षा और दलील भी गैरवाजिब है कि लोगों को कैशलेस ट्रांजैक्शन की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। इसके पीछे कुछ बड़ी मुश्किलें हैं । पहला, ये कि भारतीय अर्थव्यवस्था काफी हद तक नगदी पर आधारित है। विश्व की अन्य बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों की तुलना में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) काफी मात्रा में नोट पर ही आधारित है। जीडीपी के अलावा भारत की समानांतर अर्थव्यवस्था भी नोट के लेन-देन पर ही निर्भर है । इससे मोदी सरकार के फैसले का पूरी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ने वाला है। दूसरा, गांव के कोई अनपढ़ व्यक्ति या महिला अंगूठा लगाकर खाता तो खुलवा सकता है, लेकिन कैशलेस अर्थव्यस्था को कैसे संचालित करेगा। वह क्रेडिट या डेबिट कार्ड या ठीक से चेक का उपयोग करना नहीं जानता है।

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थमेगा नहीं , बल्कि कालाधन बढ़ने का खतरा

भारत के कुल करेंसी प्रसार में 500 और 1000 के नोटों की मौज़ूदगी 86 प्रतिशत से ज़्यादा है। ऐसे में इस बदलाव से भारत की कैश संचालित अर्थव्यवस्था पर भारी ख़तरा मंडरा रहा है। बीबीसी ने न्यूयॉर्क कोर्नेल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और विश्व बैंक के पूर्व चीफ़ इकोनॉमिस्ट कौशिक बासु के हवाले से नाटकीय रूप से इन दोनों नोटों को रद्द किए जाने के कदम को अर्थव्यवस्था को झटका देने वाला बताया है। प्रो. बासु का कहना है कि एक बार में सबकुछ करने के बावजूद ब्लैक मनी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि अब इसकी मौज़ूदगी संभव नहीं है। लोग नई करेंसी के आते ही तत्काल ब्लैक मनी ज़मा करना शुरू कर देंगे।

अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने ‘द वायर’ न्यूज वेबसाइट के एक लेख में बताया है कि सरकार के इस कदम से साफ है कि उन्हें पूंजीवाद की समझ नहीं है। आमतौर पर इस स्थिति में पूंजावादी व्यवस्था में नए बिज़नेस की ओपनिंग होती है, ताकि पुरानी करेंसी को नई करेंसी में तब्दील किया जा सके। इस हालत में लोग सामने आकर प्रस्ताव देंगे कि आप मुझे 1000 का नोट दीजिए और आपको इसके बदले 800 या 700 रुपये दिए जाएंगे। इसके परिणामस्वरूप ब्लैक मनी पर काबू पाने के बजाय काले धंधों का प्रसार बढ़ता है।

नकदी की कमी बिगाड़ेगा कारोबार

अर्थशास्त्री धीरेंद्र कुमार के मुताबिक नोटबंदी (Demonetisation) से कारोबार पर बड़ा नुकसान होगा। लोगों ने नकदी की कमी को देखते हुए खर्च करना बहुत कम कर दिया है। नकद का यह असामान्य फ्लो अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी बात नहीं। लोगों की इस आदत को सामान्य होने में काफ़ी वक्त लग सकता है। लेकिन तब तक कारोबार के चौपट होने का खतरा बहुत बड़ा हो चुका होगा। नकदी के अचानक खत्म हो जाने से कई लोग बेरोज़गार हो गए हैं। ऐसे लोग अगर 10-15 दिन भी काम के बिना रहते हैं तो उनकी कमर टूट सकती है और असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले ऐसे लोगों की संख्या लाखों में है।

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खेती पर नकारात्मक प्रभाव

ग्रामीण क्षेत्र की पूरी अर्थव्यवस्था नकद लेन-देन पर आधारित है, ऐसे में नोटबंदी (Demonetisation) का कृषि क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। मोदी सरकार के इस फैसले से रबी की फसल की बुआई के समय किसानों के पास पैसे की कमी हो गई। उनके पास खाद-बीज खरीदने के पैसे नहीं है। जिन्होंने अच्छे भाव मिलने की उम्मीद में पुरानी फसल रोक रखी थी, उनके सामने उपज बर्बाद होने का खतरा है। किसानों के पास कृषि कार्य करने वाले मजदूरों को देने के लिए भी पैसे नहीं हैं। इस तरह किसानों के साथ-साथ मजदूर वर्ग भी प्रभावित है। किसान अगर बैंकों के चक्कर लगाता रहा तो फसल की बुआई में देरी होगी। वह जितनी देर से बुआई करेगा, उतना ही उसे नुकसान होगा। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार 17 नवंबर के बाद बुआई करने पर एक एकड़ में प्रतिदिन आधा से एक क्विंटल फसल की पैदावार घट जाती है। एक बड़ी दिक्कत ये भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक शाखाओं की काफी कमी है। आरबीआई के आंकड़े के मुताबिक 93 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक की पहुँच नहीं है। इन सबका नुकसान तो किसानों को ही उठाना पड़ेगा।

रिएल एस्टेट पर गहराअसर

मकानों की ख़रीद नकदी पर बहुत ज़्यादा निर्भर थी जो अब थम-सी जाएगी। इसका असर मकानों की कीमतों पर पड़ेगा। उसमें गिरावट आएगी। इस क्षेत्र में निवेश कम होने से अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा। नोटबंदी (Demonetisation) का असर शेयर मार्केट पर भी देखने को मिला है। शेयर बाजार के मामले में भारतीय अर्थव्यवस्था का करीब 40 फीसदी हिस्सा स्मॉल और मीडियम साइज इंटरप्राइज से प्रभावित है, जोकि नकदी ट्रांजैक्शन पर चलता है। मोदी सरकार की इस घोषणा से इन कारोबारों पर असर पड़ेगा और देश की आर्थिक वृद्धि प्रभावित होगी।

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मंडियों के मंदी, लुढ़क रहा रुपया

ईपीडब्ल्यू के संपादक परंजॉय गुहा ठाकुरता का कहना है कि वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से नोटबंदी (Demonetisation) की घोषणा के बाद कुछ न कुछ संशोधन किए जा रहे हैं, लेकिन तकलीफ कम नहीं हो रही है। इस घोषणा से सबसे ज्यादा असंगठित क्षेत्र प्रभावित हुआ है। मंडियों के व्यापारी, मजदूर, किराना बाजार में लोग परेशान है। कमोडिटी पर असर पड़ रहा है। बाजारों में व्यापार ठप-सा हो गया है। रुपये की कीमत गिरी है। बाजार के माहौल में मंदी-सी है। इस कदम से अर्थव्यवस्था को धक्का जरूर लगा है।

हालात सामान्य होने में लगेंगे चार माह

भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक नोटबंदी (Demonetisation) के फैसले के बाद से अब तक 500 और 1000 के पुराने नोटों की शक्ल में बैंकों में कुल 5.44 हजार करोड़ रुपये आए हैं। इस आंकड़े के अनुसार 33 हजार करोड़ रुपये बैंकों में बदले गए हैं। 5.11 हजार करोड़ रुपये जमा किए गए हैं। बैंकों के काउंटर या एटीएम से इस दौरान 1.03 हजार करोड़ रुपये नक़द निकाले गए हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था में कुल क़रीब 14 लाख करोड़ पांच सौ और हज़ार के नोट हैं,  जिन्हें अवैध घोषित किया गया है । वहीं 10 नवंबर से हर दिन क़रीब साढ़े ग्यारह हज़ार करोड़ रुपये रोजाना निकाले गए हैं। अगर यही रफ्तार रही तो कुल क़रीब साढ़े दस लाख करोड़ के पांच सौ और हज़ार के नोटों को बदलने में क़रीब 90 काम के दिन लग सकते हैं।यानि पर्याप्त मात्रा में नकदी उपलब्ध होने में क़रीब चार महीने का वक्त लग सकता है।

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