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जानिए किन खूबियों से अखिलेश यादव ने 2012 में लिखी थी कामयाबी की इबारत

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26 January 2017

बात 2012 के विधानसभा चुनाव की है। विकास के नए वादों के साथ क्रांतिरथ पर सवार अखिलेश यादव प्रदेश के कोने-कोने में जनता से रूबरू हो रहे थे। एक युवा राजनेता की सोच और उत्तर प्रदेश के विकास के रास्ते पर ले जाने की अखिलेश यादव की दृढइच्छा को लोगों ने पहली बार गहराई से महसूस किया था। अखिलेश जनता के दिल में अपनी गहरी छाप छोड़ते जा रहे थे। विभिन्न चरणों में जैसे-जैसे वोट पड़ते जा रहे थे अखिलेश यादव की राजनीति छवि मजबूत होती जा रही थी।

तब उत्तरप्रदेश के अप्रत्याशित चुनाव में बदलते समीकरणों पर मंथन कर रहे विश्लेषक भी भौंचक थे कि सत्तारूढ़ कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी लाख जतन के बाद आखिर क्यों नाकाम हुए। इसी तरह एक अपेक्षाकृत नए युवा चेहरे अखिलेश यादव को इतनी बड़ी कामयाबी कैसे मिली। आइए जानते हैं कि आखिर ऐसे कौन सी काबिलियत थी जिसके बूते अखिलेश यादव ने कामयाबी की नई इबारत लिखी…

छोटी उम्र में बड़ी जिम्मेवारी

इंजीनियरिंग में डिग्री ले चुके अखिलेश को उत्तरप्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर समाजवादी पार्टी का प्रादेशिक अध्यक्ष बनाया गया। छोटी उम्र में अखिलेश ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया और संगठन की कमजोरियों पर ध्यान दिया।

साफ छवि, दागी बाहर

अखिलेश यादव ने दबंग और अपराधिक छवि के उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया। यहां तक की उप्र के बाहुबली नेता डीपी यादव को टिकट देने से इंकार कर दिया। वरिष्ठ नेता मोहन सिंह को भी प्रवक्ता के पद से हटा दिया गया। साफ छवि वाले आईआईएम के पूर्व प्रोफेसर अभिषेक मिश्र तथा उत्तर प्रदेश रंजी टीम के पूर्व सदस्य ज्योति यादव को भी टिकट दिया गया।

टूटे तार फिर जोड़े

अखिलेश ने कल्याण सिंह के साथ संबध तोड़ लिए जिससे मुसलमान दोबारा पार्टी की तरफ आ सकें। मुलायम सिंह के करीबी नेता अमर सिंह को भी दखल अंदाजी के चलते पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। युवाओं को अपनी साथ मिलाने के लिए टेबलेट, लैपटॉप और बेरोजगारी भत्ते जैसे लुभावने वादे घोषणापत्र में शामिल करने का विचार अखिलेश का ही था।

स्थानीय चेहरा

उत्तरप्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट से लगातार तीन बार (2000, 2004 और 2009) समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर निर्वाचित हुए अखिलेश यादव को उत्तरप्रदेश ने स्थानीय नेता के तौर पर देखा। मुलायम सिंह का पुत्र होने के नाते उन्हें प्रदेश की जनता ने घर का आदमी माना। अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित होने पर भी कभी-कभार अंग्रेजी में बाते करते सुना गया है। अखिलेश ने संवाद करते समय ध्यान रखा कि उनकी बोली में स्थानीय पुट हो।

कड़ी मेहनत और सीधा संपर्क

अखिलेश ने 2007 में सपा की करारी हार से सबक लिया और चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले वे आधे उत्तरप्रदेश का दौरा कर चुके थे। अखिलेश ने नौ हजार किमी से भी ज्यादा का दौरा किया जिसमें वे अक्सर साइकिल चलाते नजर आए।

छुपा रुस्तम

अखिलेश के साथ चाटुकार नेता और डरावने बंदूकधारी नहीं होते। उनके करीबी लोगों में साफ सुथरी छवि के लोग हैं। उन्नाव के जयनारायण डिग्री कॉलेज छात्र यूनियन के पूर्व अध्यक्ष सुनील यादव तथा राजीव राय जैसे पढ़े-लिखे लोग अखिलेश के रणनीतिकार हैं।

तय रणनीतिएक मात्र विकल्प

अखिलेश ने उत्तरप्रदेश के दौरे के समय ही भांप लिया था कि उनका मुकाबला बसपा और कांग्रेस दोनों से है। जहां उन्होंने बसपा से सीधी मुठभेड़ की, वहीं कांग्रेस से सीधी लड़ाई से बचते रहे और संयम का परिचय दे कर परिपक्वता दिखाई। उन्होंने बसपा और कांग्रेस को आपस में उलझने दिया और जनता के सामने एकमात्र विकल्प के रूप में सपा को पेश किया।

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