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क्या अखिलेश ने दे दी है राजनीति में बदलाव की दस्तक

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01 February 2017

अब यह बात स्थापित हो चुकी है कि अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश सहित देश की सियासत में एक मजबूत छत्रप के रूप में जगह बना ली है। चूंकि अभी चुनाव उत्तर प्रदेश में है तो हम बात भी इस राज्य की ही करेंगे। बात शुरू करते हैं 2012 के विधानसभा चुनाव से। तब उत्तर प्रदेश की राजनीति में अखिलेश यादव एक नई उम्मीद के रूप में सामने आए थे। युवा नेता के तौर पर जनता में उनमें असीम संभावनाओं का आभास हुआ। वैसे उस चुनाव से पहले अखिलेश यादव तीन बार सांसद चुने जा चुके थे और ‘टीपू को सुल्तान बना दो’ के नारे से क्षेत्र विशेष की जनता ने उन्हें प्रदेश और देश की राजनीति में बड़ा स्थान देने का मन बना लिया था। पर जब वे विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश को मथने निकले तो सारा उत्तर प्रदेश अखिलेश से साक्षात रूप से रूबरू हुआ। यह ऐसा दौर था जब उत्तर प्रदेश में युवा शक्ति अंगडाई ले रही थी । उसे ऐसे नेतृत्व की जरूरत थी जो उनकी बातों, जरूरतों को समझ सके। अखिलेश यादव इसे भलिभांति वाकिफ थे। अखिलेश इसमें पूरे तरह से खरे उतरे। यही वजह रही कि चुनाव के बाद जनता की मंशा भांपकर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। अपने पांच साल के पहले ही कार्यकाल में अखिलेश ने यह जता दिया कि पुराने दौर की राजनीति अब पुरानी हो चुकी है। वर्ग-धर्म से परे अब सियासत का एकमात्र मंत्र विकास हो सकता है। विकास के इसी मंत्र के साथ अखिलेश यादव ने सभी वर्ग-समुदाय को साधने की कोशिश की और कामयाब और कामयाब भी हुए।

नई सोच और असीम जोश के बूते अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल में उत्तर प्रदेश को विकास के नए दौर में स्थापित कर दिया। यह उनका ही कमाल रहा है कि आज उत्तर प्रदेश में धु्रवीकरण की राजनीति से परे सकारात्मक विकास मुद्दा बन चुका है। यह समय की जरूरत भी है। अखिलेश यादव के रूप में जनता को नई तरह की और सकारात्मक राजनीति करने वाले नेतृत्व मिल चुका है। दरअसल मतदाता हमेशा नएपन को तरजीह देता है। यह नयापन नेतृत्व का भी हो सकता है, विकास की नई सोच का भी। नयेपन का यह स्वर अगर संघर्ष की चाशनी में पगा हो तो उनका स्वाद ही अनूठा होता है। अखिलेश यादव ने हाल के अपने संघर्षों से जता दिया है कि विकास की उनकी धारणा ही उत्तर प्रदेश को नई दिशा दे सकती है।

ऐसे संघर्षों में अमूमन अपयश हाथ आते हैं, लेकिन अखिलेश यादव के संभर्द में यह बात बिल्कुल अलग नजर आती है। पहले उनकी सरकार के कामकाज को लेकर जनता के मन में कोई दुर्भाव नहीं दिखता है तो दूसरी ओर इस संघर्ष के बाद जनता का उनमें विश्वास और प्रेम और गहरा हो गया।

यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि पिछले साल हुए चुनावी सर्वेक्षण अब नए घटनाक्रम में फेल नजर आ रहे हैं। सर्वामान्य रूप् में अखिलेश यादव पहले भी जनता की पहली पसंद थे। अब के उनके नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी भी नए कलेवर में सर्वाग्रह्य होती जा रही है। चुनावी खेल के विशेषज्ञों का विज्ञान या ठीक से समझे तो उनकी कला अब चारो खाने चित नजर आ रही है। याद कीजिए पूर्वानुमान लगाने के इस धंधे का अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनावों में क्या हश्र हुआ था।यूरोपीय संघ से निकलने के मसले पर ब्रिटेन में हुए जनमत-संग्रह या फिर दिल्ली और बिहार में हुए विधानसभा चुनावों के वक्त नतीजों की भविष्यवाणियां कितनी खोखली साबित हुईं। दरअसल तब एक समय के बाद पासा पलट गया। तब नतीजों को चैंकाने वाला कहा गया। हालांकि बाद में जब बातें सामने आईं तो यह भी साबित हुआ कि चुनावी विशेषज्ञ जनता की नब्ज भांपने में विफल रहे। लेकिन इस उत्तर प्रदेश में इस बार बात अलग ही है। नए घटनाक्रम से पहले भी विशेषज्ञ अखिलेश यादव के पक्ष में जनता की लहर बात रहे थे तो अब मीडिया की सुर्खियां अखिलेश यादव के साथ उनके नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी को पक्ष में ही नजर आ रही हैं। निश्चित तौर पर यह उत्तर प्रदेश में नई सियासत की दस्तक है तो अखिलेश यादव के रूप में विकासवादी राजनीति के दूसरे सुनहरे काल का संकेत भी।

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