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महान सोच और मेहनतकश हाथों ने लखनऊ मेट्रो के सपने को बना दिया हकीकत

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03 December 2016

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

महान कवि सोहनलाल द्विवेदी ने सही ही लिखा है कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती है। जी हाँ ऐसे ही एक कोशिश शुरू की उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम कहते थे कि ‘सपना वो नहीं जो नींद में देखा जाए, बल्कि वो है जिसे खुली आँखों से देखा जाता है।’ अखिलेश यादव ने यूपी की कमान अपने हाथों में लेने के साथ प्रदेश की तरक्की के ऐसे ही सपने देखे। और उनके विश्वास, आत्मबल ने इसे यथार्थ के धरातल पर उतार भी दिया। पर ये सब कुछ इतना आसान भी नहीं था। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इस ड्रीम प्रोजेक्ट को साकार करने के लिए 5 महत्वपूर्ण पथप्रदर्शकों के साथ-साथ हजारों मजदूरों ने अपने दिन-रात एक कर दिए।

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जी हां, हम बात कर रहे हैं लखनऊ मेट्रो की। 4000 श्रमिकों की लगन और लगातार 790 दिनों की श्रमसाध्य तपन का नतीज ही है ट्रैक पर दौड़ती लखनऊ मेट्रो की चमक। लखनऊ मेट्रो रेल कारपोरेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर कुमार केशव को 27 सितम्बर 2014 की तारीख आज भी अच्छे से याद है। इसी दिन लखनऊ मेट्रो का सिविल वर्क शुरू हुआ था। लखनऊ मेट्रो की पूरी टीम पर काम समय पर पूरा करने का दबाव था। जबकि देश में अब तक कोई भी मेट्रो परियोजना अपने समय पर पूरी नहीं हो सकी थी। सवाल उठ रहे थे कि क्या 01 दिसम्बर 2016 को लखनऊ में मेट्रो को दौड़ पाएगी। ऐसे में लखनऊ मेट्रो की टीम सीएम अखिलेश की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को तय समय के भीतर साकार करने के इरादे से जी-जान से जुट गई।

काम की गतिशीलता बनाये रखने के लिए गोमती नगर स्थित मेट्रो के ऑफिस में रिवर्स क्लॉक लगाये गए। ताकि हर कर्मचारी अपने लक्ष्य को हासिल करने के प्रति अडिग रहे।  रिवर्स क्लॉक को देखकर काम की गति बनाई रखने और मेट्रो को निर्धारित अवधि में दौड़ाने की प्रेरणा मिलती रहे। हर दिन काउंटडाउन से कर्मचारियों को अपने वर्किंग टाइमिंग को मेनटेन करना होता था। कॉरपोरेट कार्यालय में ये इस तरह का पहला प्रयोग था, जो रंग भी लाया।

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दूसरी ओर लखनऊ मेट्रो के की-पर्सन यानि मेट्रो प्रोजेक्ट से मुख्य सलाहकार ई श्रीधरन, प्रदेश के पूर्व मुख्यसचिव और सीएम अखिलेश के वर्तमान मुख्य सलाहकार आलोक रंजन, कुमार केशव,  वर्क्स एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डायरेक्टर दलजीत सिंह तथा रोलिंग स्टॉक डायरेक्टर महेंद्र सिंह ने काम को समय से पूरा करने में आने वाली सभी अड़चनों को दूर करते रहे। आलोक रंजन जब मुख्य सचिव थे, तब मेट्रो के काम की शुरुआत हुई। उन्होंने ही तय किया था कि मेट्रो का ट्रायल 1 दिसंबर को होना चाहिए। काम शुरू हुआ तो मेट्रोमैन ई। श्रीधरन के डायरेक्‍शन में मेट्रो टीम ने परियोजना की गतिशीलता बनाये रखने के साथ इसे वर्ल्ड क्लास का बनाने में को कोर कसार नहीं छोड़ी। श्रीधरन की टीम के सबसे प्रमुख सदस्य कुमार केशव की अगुवाई में ही कर्मचारियों का मनोबल लगातार बढ़ता रहा। योजनाबद्ध तरीके से काम करते हुए उन्होंने सभी निर्धारित समय के भीतर ही कराये। ये उनकी कोशिशों का ही नतीजा था कि लखनऊ मेट्रो तय समय में ट्रायल के लिए तैयार हुई है। दलजीत सिंह कुमार केशव की टीम के प्रमुख सदस्य हैं और वर्क्स एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डायरेक्टर हैं। दलजीत सिंह की देखरेख में ही मेट्रो का पूरा स्ट्रक्चर तैयार हुआ। तो रोलिंग स्टॉक डायरेक्टर महेंद्र सिंह की देख-रेख में न सिर्फ लखनऊ मेट्रो के कोच बने, बल्कि रेल पटरी को बिछाने का काम भी शानदार तरीके से संपन्न हुआ।

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