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ना कोई शीश महल है , न कोई ताजमहल, है यादगार-ए-मोहब्बत तेरे प्यार का

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फ़रिशतो ढांक दो

रूहों की चादर से इसे वरना

फ़िज़ा की सांस

छू-छू कर

इसे मैला न कर डाले

– अशोक चक्रधर द्वारा रचित नाट्य कविता ‘संगमरमर का संगीत’ का एक अंश

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राहत इन्दौरी का भी एक शेर है- मैंने शाहों की मोहब्बत का भरम तोड़ दिया/मेरे कमरे में भी एक “ताजमहल” रखा हैं लेकिन बुलंदशहर के एक बुजुर्ग ने इस भ्रम को भी तोड़ दिया है, उन्होंने अपने खेत में ही अपनी बेगम की याद में एक ताजमहल तामीर कर दी है। फैजुल हसन कादरी न तो कोई शहंशाह शाहजहाँ हैं, ना ही उनकी हमराह ताजमुल्ली कोई बेगम ही थीं। बेऔलाद ताजमुल्ली को जब इस बात की चिंता सताने लगी कि उनके इंतकाल के बाद उन्हें भला याद कौन करेगा तो उनके पति रिटायर्ड पोस्टमास्टर फैजुल हसन कादरी ने अपनी बेगम से जो वादा किया, उसने आज बुलंदशहर के इस छोटे से गांव केसरकलां को मोहब्बत के पनाह के तौर पर मशहूर कर दिया है।

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ऐसी पाकीज मोहब्बत की दास्ताँ भला कहा सिमट कर रहती है, बात उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कानों तक पहुंची तो उन्होंने 80 साल के फैजुल हसन कादरी के ख्वाब को तामीर कराने के लिए मदद की पेशकश की। बुलंदशहर के बुलंदियों का नया ताज बनता कादरी साहब का यह महल रुपहले परदेवालों की  आँखों में भी नूर सा समाया तो सिनेमा के सबसे उम्दा अवार्ड की फेहरिस्त में कादरी साहब का ताजमहल भी शामिल हो गया। सुमित शॉ की यह शार्ट फिल्म The Man Who Built Another Taj फिल्मफेयर शार्ट फिल्म अवार्ड्स 2017 के लिए नामित की गयी है। आइए कादरी साहब जी जुबानी उनकी इस दास्ताँ और ताजमहल की तामीर की कहानी से हम सब भी नुमाया हों….

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14 जून 1953 को हमारी शादी हुई थी। शादी होने के बाद ताजमुल्ली बेगम जब मेरे साथ आयीं तो उन्हें रोटी बनानी नहीं आती थी। मैं उनको रोटी पकाना सिखाया। फिर वो इतनी बेहतरीन रोटी बनाने लगीं कि हमारे बनाने का सवाल ही नहीं उठता था। चावल, रोटी, मीठा, नमकीन… वो जो पका दें, हम खा लेते थे। तालीम की बात करें तो वो कुरान शरीफ अपने मायके में ही पढ़ी थीं। बाकी कोई तालीम नहीं मिली थी। इसलिए हमने उनको उर्दू की छोटी कहानियों की किताबें देनी शुरू की। धीरे धीरे उन्होंने पढ़ना सीख लिए, लेकिन उन्हें लिखना नहीं आता था। 4 अगर गिनती में लिखा हो तो तो वो समझ नहीं पाती थीं, वही चार शब्दों में लिखा हो तो पढ़ लेती थीं।

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बम्बई में तब मैं बतौर मजदूर काम करने गया था। तब के. आसिफ़ की फिल्म मुगल-ए-आज़म बन रही थी। उसी दौर में जब मैं मोहन स्टूडियो में काम करता था। विमल राय साहब देवदास फिल्म बना रहे थे। एकाध आउटडोर शूटिंग में हम भी एक्स्ट्रा के तौर पर काम किये थे। उस जमाने से 2 रुपये मिलते थे और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में डेढ़ रुपये तनख्वाह मिलती थी। 8 आने (50 पैसे) में दोनों वक़्त का पेट भर जाता था। पैसे बचते थे तो हम दोनों फिल्म देखने जाते। उनका और हमारा साथ ऐसे ही हंसी-ख़ुशी कटा। कभी लड़ाई-झगड़ा नहीं हुआ।

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हमारे बच्चे तो थे नहीं, तो कभी-कभी वो कहती थी कि हमारे मरने के बाद कौन हमारा जिक्र करेगा? तो मैंने कहा कि ये जो सामने खेत देख रही हो ना, इसी खेत में तुम्हारी इंतकाल के बाद तुम्हे दफ़न करके ऐसा मकबरा बनाऊंगा कि लोग वर्षों याद रखेंगे। 2011 में ताजमुन्नी बेगम के इंतकाल के बाद मैंने अपनी सभी पूंजी, इनके गहने बेंचकर इसे बनाना शुरू किया। इस मकबरे में ताजमुन्नी की कब्र के बगल में मैंने एक खुली कब्र भी बनवाई है, ताकि जब मेरा इंतकाल हो तो मैं भी उसके बगल में ही दफन रहूँ।

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फिल्मफेयर अवार्ड के लिए नामित इस शार्ट फिल्म के बारे में ज्यादा जानने के लिए देखें ये वीडियो

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