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सियासी समर से पहले ही विरोधयों के पांव उखाड़ रहा अखिलेश यादव का ये उदय

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02 February 2017

उत्तर प्रदेश में विकास के पर्याय बने अखिलेश यादव अब सियासत के मैदान में भी मंजे हुए महारथी नजर आ रहे हैं. उन्होंने खुद को जिस तरह से मजबूत और दृढ़ निश्चयी नेता के रूप में स्थापित किया है, वो राजनीति को नई चेतना और ऊर्जा देता है। इस सबके बीच अखिलेश यादव राष्ट्रीय क्षितिज पर छाते हुए दिखाई देते हैं। अभी तक सर्वेक्षणों में सर्वमान्य रूप से जनता की पहली पसंद बने अखिलेश अब सियासत का समर शुरू होने से पहले ही विरोधियों को मैदान छोड़ने को मजबूर कर रहे हैं। विरोधियों को भी अखिलेश यादव में प्रधानमंत्री मोदी से मुकाबले करने वाले एक मजबूत नेता की छवि दिखाई दे रही है। तो कहीं न कहीं इस बात को भी हवा मिल रही है कि 2017 में सजा यह चुनावी मंच 2019 के लोकसभा चुनाव का भी रंगमंच बनेगा। और इसके अहम् किरदार भी अखिलेश यादव ही होंगे। अखिलेश यादव भी इसी तर्ज पर कदम-दर-कदम आगे बढ़ रहे हैं।

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मुलायम सिंह यादव ने पांच साल पहले जब अखिलेश को सत्ता सौंपी थी, तो किसे अंदाजा था कि  पांच साल में अखिलेश का किरदार उत्तर प्रदेश क्या देश की राजनीति  में भी बेहद अहम् हो जायेगा। ‘गृहयुद्ध’ में भी अखिलेश आत्मविश्वास से भरे थे और चुनाव आयोग में सही साबित भी हुए। इस पूरी लड़ाई में ममता बनर्जी से लेकर शरद यादव व अजित सिंह तक ने अखिलेश यादव का साथ दिया। ममता बनर्जी ने तो बाकायदा लड़ाई के बीच में उन्हें शुभकामनाएं भी दी थीं। अब जब अखिलेश समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर चुके हैं, उनके रूप में मोदी विरोधियों को एक मजबूत छत्रप मिलता नजर आ रहा है। वे राष्ट्रीय स्तर पर विचार विमर्श में जुटे हैं और भविष्य के महागठबंधन के मजबूत चेहरे के रूप में खुद को स्थापित कर रहे हैं।

इसे अखिलेश की मजबूती ही कहेंगे कि कांग्रेस इस पूरे प्रकरण से सर्वाधिक उत्साहित है। कांग्रेस ने साफ कह दिया था कि वह समाजवादी पार्टी से गठबंधन तभी करेगी, जब अखिलेश मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। अब जब अखिलेश पार्टी की अंदरूनी लड़ाई जीत चुके हैं, गुलाम नबी आजाद तक ने सीधे गठबंधन की बात कह दी है। शीला दीक्षित अपनी उम्मीदवारी वापस ले चुकी हैं और राहुल गांधी के साथ सीधी वार्ता पर सहमति बन चुकी है। राक्रांपा जैसे दल स्वयमेव आगे आकर गठबंधन की बात कर रहे हैं, वहीं लोकदल मुखिया अजित सिंह को भी अखिलेश के साथ आगे बढऩे की उम्मीद है। अब यदि सपा-कांग्रेस-रालोद सहित गैर भाजपा-बसपा राजनीतिक गठबंधन बनता है तो सबको चमत्कारिक नतीजों की उम्मीद भी है।

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भले ही राजनीतिक खींचतान मची रही हो, किन्तु इस घमासान से अखिलेश यादव ने भाजपा व बसपा से चुनाव से ठीक पहले संभावनाओं का बड़ा आसमान छीन लिया है। जब प्रधानमंत्री मोदी यहां रैलियां कर रहे थे, बसपा मुखिया मायावती अपनी प्राथमिकताएं गिना रही थीं, मीडिया से लेकर चूल्हे-चौके तक की सुर्खियों में अखिलेश थे। बीते छह माह में अखिलेश ने मुख्तार अंसारी से लेकर अतीक तक का विरोध कर अपनी एक आदर्श छवि तो स्थापित ही की है, परिवार के दबाव से बाहर आने जैसी छवि का निर्माण भी किया है। यही कारण है कि जहां कांग्रेस व अन्य छोटे दल सपा के साथ गठबंधन की संभावनाएं तलाश रहे हैं, बसपा व भाजपा को अपनी पूरी रणनीति ही बदलने पर विवश होना पड़ा है।

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