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भाजपा-कांग्रेस की सरकारों ने भारत में शिक्षा को 50 साल पीछे धकेला

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07 September, 2016

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की सरकार भले ही शिक्षा में आमूल-चूल बदलाव लाने की बड़े-बड़े वादे कर रही है, लेकिन केंद्र में उनकी सरकार गठन के बाद से अब तक इसमें कोई सुधार नहीं दिख रहा है। जबकि यह सामान्य धारणा है कि शिक्षा के बिना विकास संभव नहीं है। ऐसे में भारत के लिए बेहद चिंताजनक बात सामने आई है। सबको शिक्षा दिए जाने के लक्ष्यों को पाने में भारत फिलहाल 50 साल पीछे है।

पिछले दिनों एसोचैम ने जहां देश की शिक्षा प्रणाली पर सवालिया निशान उठाते हुए कहा था कि कुछ प्रमुख बिजनेस स्कूलों को छोड़ कर बाकी संस्थानों से निकलने वाले एमबीए डिग्रीधारकों को नौकरी नहीं मिल रही है। देश के लगभग साढ़े पांच हजार स्कूलों से हर साल निकलने वाले ऐसे युवकों में से महज सात फीसदी को ही नौकरी मिल पाती है। इसी वजह से बीते साल देश के विभिन्न शहरों में 220 ऐसे स्कूल बंद हो गए। जबकि चालू वित्त वर्ष के दौरान और 120 बिजनेस स्कूलों पर बंदी की तलवार लटक रही है। इंजीनियरिंग के मामले में भी यही स्थिति है। देश में हर साल 15 लाख इंजीनियर बनते हैं, लेकिन उनमें से आधे से ज्यादा को या तो नौकरी नहीं मिलती या फिर उनको बेहद मामूली वेतन पर काम करना पड़ता है। अब यूनाइटेड नेशन की रिपोर्ट में भी देश की पूरी शिक्षा प्रणाली पर प्रश्न चिह्न लगा दिए हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सबको शिक्षा दिए जाने के लक्ष्यों को पाने में 50 साल पीछे है।

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संयुक्त राष्ट्र की शैक्षिक संस्था यूनेस्को की इस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर वर्तमान रफ्तार से चले तो वैश्विक शिक्षा प्रतिबद्धता को हासिल करने में भारत आधी सदी पीछे रह जाएगा। अगर भारत 2030 के सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करना चाहता है तब देश की शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी बदलाव की जरूरत होगी। जिस तरीके से शिक्षा को लेकर काम हो रहे हैं उससे भारत को प्राथमिक शिक्षा के मोर्चे पर सफलता मिलने में 2050, निम्न माध्यमिक शिक्षा के मोर्च पर 2060 और उच्च माध्यमिक शिक्षा के मोर्चे पर 2085 तक का वक्त लग जाएगा। यूनेस्को की नई वैश्विक शिक्षा निगरानी यानी ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग (जीईएम) की रिपोर्ट कहती है कि भारत के लिए 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को पाना भी पाना मुश्किल है।

 

भारत में छह करोड़ से ज्यादा बच्चों को बहुत कम या बिल्कुल भी औपचारिक शिक्षा नहीं मिल रही है। जबकि देश में एक करोड़ 11 लाख बच्चे निम्न माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ देते हैं। यहां दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले ज्यादा है। उच्च माध्यमिक स्तर पर 4 करोड़ 68 लाख बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। वहीं 29 लाख बच्चे प्राथमिक स्तर की शिक्षा से वंचित हैं। यूएन की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 ऐसे 4 करोड़ कामगारों की कमी हो जाएगी, जिन्होंने उच्च माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त की हो। टाइम्स ऑफ इंडिया ने जीईएम रिपोर्ट के डायरेक्टर के हवाले से यह जानकारी दी है।

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डीडब्ल्यू डॉट कॉम के अनुसार, दुनिया भर में 10 से 24 साल की उम्र के सबसे अधिक युवाओं वाले देश भारत में उच्च शिक्षा अब भी गरीबों की पहुंच से दूर लगती है। फिलहाल विश्व की तीसरी सबसे बड़ी शिक्षा व्यवस्था में सबकी हिस्सेदारी नहीं है। नरेंद्र मोदी की सरकार ने मेडिकल और इंजीनियरिंग के और भी ज्यादा उत्कृष्ट संस्थान शुरू करने की घोषणा तो की है. लेकिन बुनियादी ढांचे और फैकल्टी की कमी की चुनौतियों से निपटने के कोई कारगर उपाय नहीं किए गए है। इससे उनकी घोषणा भी दूसरे वादों की तरह महज कोरे आश्वासन ही लगते हैं। वहीं बेहतर शिक्षा तक अभी तक सिर्फ अमीरों की पहुंच संभव हो सकी है।

देश के कई उत्कृष्ट शिक्षा संस्थानों और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में भी फिलहाल 30 से 40 फीसदी शिक्षकों की सीटें खाली पड़ी हैं। नासकॉम की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में डिग्री हासिल करने के बाद भी केवल 25 फीसदी टेक्निकल ग्रेजुएट और लगभग 15 प्रतिशत अन्य स्नातक आईटी और संबंधित क्षेत्र में काम करने लायक होते हैं। यानी उन्हें सिर्फ डिग्री मिल रही है, न कि बेहतर शिक्षा।

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कोटा, राजस्थान में कई मध्यमवर्गीय परिवारों के लोग अपने बच्चों को आईआईटी और मेडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए भेजते हैं। महंगे कोचिंग सेंटरों में बड़ी बड़ी फीसें देकर वे बच्चों को आधुनिक युग के प्रतियोगी रोजगार बाजार के लिए तैयार करना चाहते हैं। इस तरह से गरीब बच्चे पहले ही इस प्रतियोगिता में बाहर निकल जाते हैं। जबकि केंद्र सरकार की ऐसी कोई नीति नहीं है जिससे गरीब बच्चे भी आधुनिक युग के प्रतियोगी बाजार में ताल ठोंक कर खड़े हो सकें। इसमें सिर्फ वर्तमान मोदी सरकार के साथ पूववर्ती कांग्रेस की सरकारें भी जिम्मेदार हैं, जिसने इस व्यवस्था और शिक्षा तंत्र में बदलाव लाने के बारे में गंभीरता से काम नहीं किया।

 

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दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी जैसे दल खुद को दलित समुदाय का प्रतिनिधि और कल्याणकर्ता तो बताते रहे हैं। लेकिन चुनावी रैलियों में दलित समुदाय की ओर से पार्टी के समर्थन में नारे लगवाना एक बात है, लेकिन सत्ता में आने पर उनके उत्थान और विकास के लिए जरूरी शिक्षा और रोजगार के मौके दिलाना बिल्कुल दूसरी बात। नारे और लुभावने पार्टी मैनोफेस्टो इन दलों के लिए सिर्फ सत्ता हथियाने का एक जरिया मात्र है।

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इन सब के बीच सुखद बात यह है कि उत्तर प्रदेश में इनसे उलट शिक्षा को बेहतर और सबके लिए सुलभ बनाने का काम किया जा रहा है। अखिलेश सरकार ने जहां प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए शिक्षा मित्रों सहित करीब दो लाख अध्यापकों की नियुक्ति की है, वहीं उच्च शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए प्रदेश में 26 राजकीय मॉडल महाविद्यालयों को खोला गया है। आईआईटी और आईआईआईटी की स्थापना भी की जा रही हैं। तो 100 मॉडल स्कूल खोले गए हैं। निम्न आय वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र-छात्राओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निःशुल्क तैयारी कराने की व्यवस्था भी की गई है। छात्रवृत्ति की विभिन्न योजनाओं को चलाकर मेधावी विद्यार्थियों के लिए शिक्षा को आसान बनाया गया है। वहीं फ्री लैपटॉप  वितरण योजना से उन्हें उच्च और तकनीकी शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा हैं। तो इंटर के बाद बेटियों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए कन्या विद्याधन की व्यवस्था की गई है। इतना ही नहीं एमबीबीए की 700 सीटों का इफाजा किया गया है तो करीब 75 पॉलीटेक्निक संस्थाओं की स्थापना हो रही है।

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पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने कभी देश में शिक्षा ढांचे में संपूर्ण बदलाव लाने की वकालत की थी। उनका मानना था कि युवाओं में ऐसे कौशल विकसित किए जाएं जो भविष्य की चुनौतियों से निपटने में मददगार हों। अखिलेश सरकार ने उनके इस सपने को पूरा करने का संकल्प लिया और उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन की स्थापना कर उसका ऐसा क्रियान्चयन किया कि पूरे प्रदेश में इस मिशन से 23 लाख से ज्यादा युवा रोजगारपरक प्रशिक्षण पा रहे हैं। इस मिशन की सफलता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश कौशल मिशन से प्रशिक्षण पाने के बाद एक लाख से ज्यादा युवाओं को नौकरी भी मिल चुकी है।

अखिलेश सरकार की ये उपलब्धियां बताती हैं कि सही नीतियों के साथ अगर ईमानदार कोशिश हो तो पूरे देश में शिक्षा प्रणाली को बेहतर बना जा सकता है। जिससे अभी देश में जो शिक्षा का लक्ष्य पचास साल पीछे चल रहा है, वह महज पांच साल में हासिल किया जा सकता है।

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