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तो क्या भाजपा में शामिल होते ही दलबदलू नेताओं का शुद्धिकरण हो गया

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03 September, 2016

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे दल और दिल बदलने का खेल तेज हो गया है। नग्न अवसरवाद और मूल्यहीनता का खुला खेल चल रहा है। इसमें भाजपा सबसे आगे दिखाई दे रही है। विधानसभा चुनाव 2012 में बाबूसिंह कुशवाहा को शामिल करने के बाद मचे बवाल और चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद भाजपा नेताओं ने दलबदलुओं को गले न लगाने की जो कसमें खाई थीं, सत्ता की भूख में एक बार फिर भाजपा उसे भूल चली है। इसी का नतीजा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले से दलबदलुओं का भाजपा का दामन थामने का सिलसिल चला, वह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आहट के साथ और तेज हो गया है।

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बसपा विधायक बाला प्रसाद अवस्थी ने अपने पुत्र राजीव के जरिये उसी तरह भाजपा से रिश्ता जोड़ा है, जैसे लोकसभा चुनाव से पहले बृजभूषण शरण सिंह ने अपने पुत्र प्रतीक सिंह के जरिये पार्टी में एंट्री ली थी। उत्तर प्रदेश के एक दिन के मुख्यमंत्री के रूप में पहचाने जाने वाले जगदंबिका पाल ने 2009 में डुमरियागंज लोकसभा सीट से चुनाव जीता था। इससे पहले वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सहित दूसरे महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। चुनाव जीतने के बाद वे टीवी चैनलों पर कांग्रेस का पक्ष बहुत मजबूती से रखते देखे जाते थे। 2014 के चुनाव में उनका मन बदल गया तो पिछले दरवाजे से भाजपा में एंट्री लेने के लिए गोरखपुर में आरएसएस कार्यालय माधवधाम की परिक्रमा करने लगे। बहरहाल एंट्री तो हो गई पर न पुराना रूतबा बचा और न ही पार्टी में कोई रोआब।

रामकृपाल यादव बिहार में लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के पुराने सिपाही रह चुक है। 2014 में वे पाटलिपुत्र क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहते थे। राजद ने यहां से लालू यादव की बेटी मीसा यादव को टिकट दे दिया। यही बात उन्हें नागवार गुजरी और थाम लिया भाजपा का दामन। जिस भाजपा और उस की सांप्रदायिकता को कोसकोस कर रामकृपाल यादव ने अपनी राजनीति को आगे बढ़ाया, आज उसी भाजपा की शान में कसीदे पढ़ते हैं।

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कांग्रेस विधायक प्रदीप चौधरी शिव गणेश लोधी सहित कई नेता लगातार भाजपा में शामिल हो रहे हैं। पिछले दिनों बसपा ने आगरा में एक बड़ी रैली का आयोजन किया था जिसमें बसपा नेत्री मायावती ने पीएम मोदी व केंद्र की भाजपा सरकार को जमकर लताड़ा था लेकिन रैली के चैबीस घंटे भी नहीं बीते थे कि बसपा के बड़े ब्राहमण नेता ब्रजेश पाठक भाजपा में शामिल हो गए। सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि पाठक आगरा में बसपा की आयोजित सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय रैली में शामिल हुए थे और पीएम मोदी तथा भाजपा सरकार की नीतियों पर जमकर प्रहार भी किये थे लेकिन पता नहीं चौबीस घंटे के अंदर ही ऐसा क्या हो गया कि वे बसपा का दामन छोड़कर भाजपाई बन गये। ब्रजेश पाठक उप्र में उन्नाव जिले की राजनीति करते हैं तथा विगत लोकसभा चुनावों में भाजपा के उन्नाव के सांसद साक्षी महाराज ब्रजेश पाठक को पूर क्षेत्र में गुंडा कहकर उनके अपराधों की लम्बी फेहरिस्त लेकर घूमा करते थे। आज वहीं पाठक कमल के फूल के सिपाही हो गये हैं। उनसे पहले कभी मोदी को कसाई जैसा बताने वाले और शादी ब्याह में गौरी-गणेश की पूजा न करने की बात कहने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य भी भाजपा की गोद में जा बैठे।

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पूर्व विधायक रामआसरे अग्निहोत्री, महेश त्रिवेदी, पूर्व सांसद गोरखनाथ पांडेय व बसपा शासन में एक आयोग की अध्यक्ष रहीं आभा अग्निहोत्री सहित कई भाजपा में आ चुके हैं। भाजपा में हाल-फिलहाल में शामिल होने वालों में वे भी हैं जो कभी भाजपा में ही थे, पर भाजपा का जहाज डूबते देख दूसरे पार्टी के साथ हो लिए। और अब जब पुराने दल या अपने क्षेत्र में हाशिए पर हो गए तो उन्होंने दोबारा भाजपा अच्छी लगने लगी और भाजपा को दूसरे दल के वे नेता भी भाने लगे, जो कभी उन्हें पानी पी-पीकर कोसते थे। वहीं भाजपा को ऐसे नेता तब निकम्मे, भ्रष्ट और गुंडा दिखाई देते थे। ऐसे में सवाल लाजिमी है कि भाजपा में शामिल होते ही क्या ऐसे सभी नेताओं का शुद्धिकरण हो गया?

 

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