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सभी सर्वे बता रहे अखिलेश यादव का दोबारा मुख्यमंत्री बनना तय

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03 February 2017

आने वाला वक़्त उत्तर प्रदेश की तकदीर और तस्वीर तय करने वाला है। चुनाव होने में कुछ ही समय शेष है और ऐसे में हर राजनीतिक दल अपने अपने योद्धाओं के साथ रणक्षेत्र में उतर रहे हैं। भाजपा जहाँ परिवर्तन रैलियों के माध्यम से वोटरों को लुभाने में लगी है तो कांग्रेस किसान यात्रा के माध्यम से किस्मत आजमा रही है। वहीँ अखिलेश यादव के शानदार नेतृत्व में समाजवादी पार्टी भी रथ यात्रा निकाल कर अपने इरादे बुलंद कर रही है।

उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव देश के राजनीतिक खेल के मैदान में सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा है। इस बार यूपी का मुख्यमंत्री कौन होगा इसे लेकर भी गाँव की चौपालों से लेकर शहर के गली मोहल्लों तक अटकलों का दौर जारी है। लोगों के अपने अपने मत है, अपनी अपनी वजहें पर इस बीच ख़ुफ़िया विभाग ने पूरे प्रदेश में जनता के बीच जाके सर्वे करवाया और उसके जो परिणाम निकल सामने आये वो अखिलेश यादव के लिए खुशखबरी लेकर आये हैं।

ख़ुफ़िया विभाग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इसमें कोई शक नहीं है कि समाजवादी पार्टी की सरकार फिर से बन रही है और अखिलेश यादव को भारी जनसमर्थन मिल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार अकेले दम पर समाजवादी पार्टी को 200 से ज्यादा सीटें मिलती दिख रही है। पिछले विधानसभा चुनाव परिणामों पर नज़र डालें तो सपा को कुल 403 में से 224 सीटों पर शानदार विजय मिली थी और करीब 108 सीटें ऐसी रही थीं जहाँ सपा दूसरे नंबर पर रही थी। मतलब बहुत मामूली अंतर से हार गयी थी।

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अब अगर ऐसा होता है कि भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा अलग अलग होके चुनाव लड़ें तो भी रिपोर्ट के अनुसार समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। ऐसी स्थिति में सपा को 200 बसपा को 70-80 कांग्रेस को 20-25 और भाजपा को 65 से 75 सीटें मिलने का अनुमान है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कांग्रेस और सपा का गठबंधन हो जाए तो उस स्थिति में सपा को 270 से ज्यादा सीटें मिलेंगी, और अगर ऐसा होता है तो इसमें सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा और बसपा का होगा जबकि सबसे ज्यादा फायदा सपा को मिलेगा।

अब अगर आप वोट प्रतिशत की बात करें तो पिछले चुनाव में सपा को करीब 30% और कांग्रेस को करीब 12% वोट मिला था। अब अगर दोनों दल मिलकर चुनाव लड़ें तो ये वोट प्रतिशत मिलकर लगभग 40% से ज्यादा हो जाता है और फिर इस गठबंधन को 300 से भी ज्यादा सीटें मिलेंगी।

बात अखिलेश यादव के कार्यकाल कि करें तो उनकी जब उत्तर प्रदेश की सियासत में ताजपोशी हुई तो वो प्रदेश के सबसे कम उम्र में बनने वाले मुख्यमंत्री हुए। राजनीतिक अनुभव बहुत तो नहीं था पर एक ग़ज़ब की तासीर थी उनके अंदर जो एक नयी सुबह का एहसास करा रही थी। लोगों की उम्मीदें समाजवाद के इस नए चितेरे और पहरुआ से लगातार बढ़ रही थीं।

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मुख्यमंत्री बनने के बाद करीब छह महीने का समय अखिलेश के लिए बेहद मुश्किल भरे रहे। मायावती की सत्ता जाने के बाद प्रदेश में एक नयी सरकार आई थी और तमाम चीजें बिखरी हुई थीं। मायावती ने जहाँ सरकारी धन का दुरूपयोग कर कर के खज़ाना खाली छोड़ दिया था, वहीँ कानून व्यवस्था भी अच्छी दशा में नहीं थी। विरोधी भी लगातार अखिलेश यादव की कार्यक्षमता पर सवाल पर सवाल उठाये जा रहे थे, पर कहते हैं ना कि जब आप किसी पौधे को लगाते हैं तो उसे लहलहाने में थोडा सा वक़्त तो लगता ही है, ऐसे में अखिलेश यादव ने उन छह महीनों में अपने प्रदेश की ज़रूरतों को बहुत अच्छी तरह से समझा, किसानों से लेकर आम आदमी की तकलीफों को जाना और समझा और उसके बाद जब अखिलेश यादव अपने फॉर्म में आना शुरू हुए तो फिर उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बना के ही माने।

इन सबका असर रहा कि अखिलेश यादव जनता के दिलों पर छा गए। आज जहां नोटबंदी के चलते जहां लोग बीजेपी से नाराज है, बसपा से बिखराव हो चुका है तो वहीं समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की लहर पूरे उत्तर प्रदेश में छा चुकी है। ऐसी हालत में अखिलेश यादव का दोबारा उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय है। यह बात हर सर्वे में भी नजर आ रही है।

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