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6 करोड़ बच्चों को अखिलेश सरकार ने दिया सेहत का ‘आशीर्वाद’

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July 08, 2016
शरीर स्वस्थ होगा तभी दिमाग भी तेज होगा। यह सिर्फ जुमला नहीं है, बल्कि सच्चाई है। चूंकि बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं, लिहाजा उनकी सेहत का ख्याल भी बेहद जरूरी होता है। बात जब उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की हो तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि इस प्रदेश में करीब 8.5 करोड़ यानी एक तिहाई से ज्यादा आबादी 2 से 18 वर्ष तक के बच्चों की ही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के समग्र विकास में बच्चों का कल्याण और उन्हें सेहतमंद बनाना बेहद जरूरी हो जाता है। इनमें से ही करीब 6 करोड़ बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस आयु वर्ग की शिक्षा से लेकर पोषण तक के क्षेत्र में कई अहम काम किए हैं। बच्चों का शैक्षिक स्तर सुधारने के लिए ‘शिक्षा का अधिकार कानून’ का राज्य में कठोरता से पालन करवाने के बाद अब उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए भी विशेष ‘आशीर्वाद बाल स्वास्थ्य गारंटी योजना’ लागू किया।

 

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 ऐसी योजना चलाने वाला देश का तीसरा राज्य है यूपी

दरअसल, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में सरकार के गठन के बाद से ही इस क्षेत्र में तैयारियां तेज कर दी गई थीं। इसके परिणामस्वरूप 2013 में समाजवादी सरकार ने आशीर्वाद बाल स्वास्थ्य गारंटी योजना लाकर बच्चों खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले स्कूली बच्चों की सेहत संवारने की दिशा महत्वपूर्ण प्रयास शुरू किए। योजना के तहत राज्य में बच्चों के स्वास्थ्य और चिकित्सा व्यवस्था पर एक ओर जहां जोर दिया जा रहा है, वहीं इसका विस्तार करते हुए इसी योजना के अंतर्गत दो से 10 साल के बच्चों का मुफ्त इलाज की भी व्यवस्था की गई है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु के बाद उत्तर प्रदेश भारत की तीसरा ऐसा राज्य है, जहां बच्चों की सेहत को ध्यान में रखकर खास योजना चलाई जा रही है।

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तीन चरण में हर बच्चों को सेहतमंद बनाएगी योजना

आशीर्वाद योजना की व्यापकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता हैं कि इससे दायरे में राज्य के एक लाख स्कूल शामिल हैं, जबकि इस योजना के माध्यम से छह करोड़ से ज्यादा बच्चे लाभांवित हो रहे हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम के अंतर्गत चलाई जा रही इस योजना में ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों की गंभीर बीमारी का निःशुल्क इलाज कराने की व्यवस्था हैं। सभी सरकारी, प्राइमरी और पूर्व माध्यमिक, हाईस्कूल विद्यालयों को इस योजना में सम्मिलित किया गया है। योजना की तीन चरण में लागू करने की तैयारी है। पहले चरण में जहां ग्रामीण क्षेत्रों के प्राइमरी और सेकंडरी स्कूलों में बच्चों को लाभ दिया जा रहा है, वहीं दूसरे चरण में इसमें कक्षा एक से बारहवीं तक के सभी सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूल, श्रम और सामाजिक कल्याण विभाग के सहयोग से चल रहे स्कूल, बाल सुधारगृह और आंगनबाड़ी केंद्रों को भी शामिल करने की तैयारी है। इसके बाद तीसरे चरण में उन बच्चों को भी शामिल करने की तैयारी है, जो किन्हीं कारणों से स्कूल नहीं जाते हैं।

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साल में दो बार स्कूलों में मेडिकल कैंप

इस योजना का उद्देश्य नवजात और बच्चों के स्वास्थ्य की देखरेख के उचित मानदंड स्थापित करना है। इसके तहत 14 साल से कम उम्र के स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए यूपी के सभी 820 ब्लॉकों में 2 डॉक्टरों और 2 पैरा मेडिकल कर्मचारी की टीम गठित की गई हैं। ये टीम साल में दो बार हर स्कूल में मेडिकल कैंप लगाकर बच्चों के स्वास्थ्य की जांच करती है और जरूरत पड़ने पर उनका इलाज भी करती हैं। मेडिकल कैंप में बच्चों के लंबाई, वजन और खान-पान का रिकार्ड तैयार किया जाता है और दांतों व आंखों की जांच भी की जाती हैं।

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सरकार करती है इलाज पर खर्च

योजना के तहत स्कूली बच्चों में खून की कमी दूर करने के लिए आयरन की गोलियां और क्रीमिनाशक बांटी जाती हैं। जांच में यदि बीमारी गंभीर पाई जाती है तो बच्चे को विशेषज्ञ को दिखाया जाता हैं। फिर भी हालत में सुधार नहीं हाने पर उसे बड़े अस्पताल में रेफर किया जाता है। बच्चे के इलाज में जो भी खर्च आता है, उसे सरकार वहन करती है।

जानिए कैसे होता है इस योजना के तहत काम

  • योजना में सबसे पहले आशा, आंगनवाड़ी कार्यकत्र्री और एएनएम गांव-गांव में घूमकर बच्चों का डाटा बैंक तैयार करती हैं
  • इसमें आयोडीन, फोलिक एसिड की कमी और आंख आदि की जांच की जाती है
  • बच्चों की बीमारी की रिपोर्ट तैयार कर हेल्थ कार्ड बनाया जाता है, जिससे बच्चे का नियमित इलाज किया जा सके
  • चिकित्सक और पैरामेडिकल टीम को रिपोर्ट भेजी जाती है
  • जिले में एक चिकित्सक और पैरामेडिकल स्टाफ की प्रशिक्षित टीम एंबुलेंस के साथ सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात रहती है
  • बच्चों की बीमारी की जांच कर उसे विशेषज्ञ चिकित्सकों को दिखाया जाता है
  • स्थिति गंभीर होने पर बच्चे को बीमारी के बेहतर इलाज के लिए बड़े अस्पताल में रेफर किया जाता है
  • इलाज में आने वाले खर्च को एनआरएचएम के तहत प्रदेश सरकार द्वारा वहन किया जाता है

 

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