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10 बातें, जिससे मोदी सरकार ने देश को मुश्किल में डाला

28 February 2017

जिन सपनों को दिखाकर नरेन्द्र मोदी ने देश में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, आज ढाई से तीन साल बाद वे सपने पानी के बुलबुले की तरह फूट रहे हैं। मोदी सरकार में कार्यक्रम शुरू होने के पहले उसका शोर तो बहुत होता है, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं उतरता। सरकार ने विदेशों में जमा कालाधन लाने का वादा किया था, उल्टा देश की जनता को ही लाइन में लगा दिया। युवाओं को रोजगार देने की बात कही, जबकि नौकरियां घटने लगीं। आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम लगाने की बात की तो देश में मुंबई के आतंकी हमले से बड़ा पठानकोट का हमला हो गया। नाकामियों की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन इन सबके बाद भी मोदी सरकार चेत नहीं रही, उल्टा अपनी पीठ थपथपा रही है। इससे देश के सामने गंभीर संकट पैदा हो रहे हैं।

1) नोटबंदी से अर्थव्यवस्था चौपट

केंद्र की बीजेपी सरकार ने कालाधन बाहर निकालने की बात कहकर अचानक ही 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटबंद कर दिए। अपनी मेहनत और ईमानदारी की कमाई के लिए लोगों को कई-कई दिन लाइन में लगा रहना पड़ा। बिना तैयारी लागू किए गए इस निर्णय से हाल ये हुआ कि दूरदराज के इलाकों के एटीएम में अभी तक पैसा नहीं पहुंचा है। चर्चा तो ये भी है कि नोटबंदी के वक़्त देश में 500 और 1000 के 15 लाख करोड़ रुपये के मूल्य के नोट प्रचलित थे। उन्हें वापस लेने के दौरान केंद्र सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के मूल्य के नए नोट छाप दिए। इससे बाजार में अतिरिक्त 5 लाख करोड़ रुपये कालाधन के रूप में आ गया। चर्चा तो ये भी है कि बैंकों में भी 20 लाख करोड़ रुपये जमा हुए, यानी 5 लाख करोड़ रुपये ज्यादा। मतलब कालाधन निकला नहीं, उल्टा 10 लाख करोड़ रुपये ज्यादा हो गया। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केंद्र सरकार की इस गलती से आने वाले दिनों में देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ी चोट लग सकती है।

2) बेरोजगारी पांच साल के अपने सबसे ख़राब स्तर पर

बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में जोर शोर से दावा किया था कि हर साल दो करोड़ युवाओं को नौकरी देंगे। लेकिन अपने बजट में इसकी कोई व्यवस्था नहीं की। युवाओं को रोजगार देने की दिशा में भी अपेक्षित ठोस प्रयास नहीं किए। नतीजा ये हुआ कि बेरोजगारी दर पांच साल के अपने सबसे ख़राब स्तर पर पहुंच गई। जहां नौकरी बढ़नी चाहिए थी, वह उल्टा घटने लगी है।

3) शिक्षा का बजट बढ़ाने के बजाय घटाया

एसोचैम की ताजा रिपोर्ट में देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में शिक्षा व्यवस्था में प्रभावशाली बदलाव नहीं किए गए तो विकसित देशों की बराबरी करने में छह पीढियां या 126 साल लग जाएंगे। जहां केंद्र सरकार ने रक्षा बजट 6 गुना किया, वहीं लगातार दो साल शिक्षा बजट घटा दिया गया। साठ साल के इतिहास में लगातार दूसरी बार मोदी सरकार में ही ऐसा हुआ है कि शिक्षा का बजट बढ़ाने की बजाए घटा दिया गया है।

4) आतंकवाद रोकने में नाकाम

बीजेपी के नेता, खासकर नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनाने से पहले आतंकवाद के मसले पर बेहद सख्त कदम लेने की पैरवी करते थे। प्रधानमंत्री बनाने के बाद उनके स्वर बदल गए। वे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के वहाँ चाय पीने जाने लगे तो सरहद पर जवान गोलियां खाते रहे। पठानकोट और उरी में पाकिस्तानी आतंकियों के सेना के कैम्प में घुसकर गोलियां बरसाईं। पठानकोट का आतंकी हमला तो देश में अब तक हुए आतंकी हमलों में सबसे बड़ा था, 26/11 के मुंबई हमले से भी बड़ा। इसके बाद भी प्रधानमंत्री जी ने पाकिस्तानी आईएसआई को जांच करने दिया।

सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर भी देश में पहली बार सेना द्वारा ऐसी करवाई का भ्रम फैलाया गया। लेकिन सवाल ये भी है कि सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के बाद क्या सरहद पर आतंकी गतिविधियाँ थम गईं?

 

5) लगातार बढ़ रही महंगाई

एक और जहां बीजेपी की सरकार उज्जवल योजना की तारीफ में कसीदे गढ़ी जा रही है, वहीं पिछले तीन साल में रसोई गैस के सिलेंडर के दाम 400 रुपये से बढ़ाकर 700 रुपये तक कर दिए गए। इसे सहूलियत कहें या कारोबार का तरीका। इसी तरह दाल के दाम में उतना इजाफा हुआ कि वो गरीबों की थाली से ही गायब हो गई। तुर्रा ये कि सरकार ने पूँजीपति अदानी को जो दाल 50 रुपये प्रति किलो के भाव से दिया, अदानी ने वालमार्ट के जरिये उसे जनता को 200 रुपये में बेंचा। बात यहीं ख़त्म नहीं होती। पेट्रोल-डीजल के दाम अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कम होते गए, इसके बावजूद केंद्र सरकार उसका दाम बढ़ाती ही गई।

 

6) आदर्श ग्राम योजना फेल

लगता है बीजेपी के सांसद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी नहीं सुनते हैं। प्रधानमंत्री ने सांसदों से अपील की थी कि वे हर साल एक गांव को गोद लेकर उसे आदर्श गांव में विकसित करेंगे। खुद प्रधानमंत्री ने पहले साल वाराणसी में जयापुर गांव को गोद लिया। वहां विकास कार्य ऐसे हुए कि शौचालय बना तो गड्ढा नहीं खुदा। स्नानघर बना तो पानी का नल और टंकी नहीं लगा। सड़कें बनीं तो ईंट अगले दिन ही उखड़ गए। उन्होंने दूसरा कौन सा गांव गोद लिया, उसका तो पता ही नहीं चला। वैसे बीजेपी के दूसरे सांसदों ने इतना भी नहीं किया। उत्तर प्रदेश से बीजेपी के 73 सांसद हैं, उनसे से ज्यादातर अपने क्षेत्र में जाते ही नहीं। कई इलाकों में तो लोगों ने उनके लापता होने के पोस्टर भी लगा दिए थे।

 

7) स्मार्ट सिटी, नमामि गंगे योजना हवा में

बड़े-बड़े मानक तय कर देश में 100 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने का सपना दिखाया गया, लेकिन खूब हो-हल्ला के बाद ये योजना भी हवा हो गई। उत्तर प्रदेश के हिस्से में 13 शहर तो आए लेकिन इस योजना का कोई काम जमीन पर नहीं उतरा। अब केंद्र सराकर का कोई व्यक्ति या सांसद इस योजना का जिक्र भी नहीं कर रहा है।

इसी तरह एक योजना है नमामि गंगे। मोदी जी की सरकार ने इसके लिए बाकायदा अलग मंत्रालय बनवाया और लंबे-चौड़े बजट बनाए गए। इसके बाद भी तीन साल में तीन कदम भी गंगा साफ़ नहीं हुई। दुखद ये है कि अलग मंत्रालय बनाने के बाद भी इस दिशा में कोइम काम नहीं हुआ।

 

8) मुस्लिम और दलित उत्पीड़न बढ़े

ऊना के दलितों को बेरहमी से पिटाई की जिसने भी तस्वीर देखी, उसका दिल दहल गया। केंद्र में बीजेपी की सरकार आने के बाद दलितों पर हमले के मामले बढ़े हैं। वहीं अल्पसंख्यकों के असुरक्षा का माहौल पैदा हुआ है। अमेरिका के एक पैनल की रिपोर्ट की मानें तो ‘मोदी सरकार में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं।’ यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने 2015 की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से भारत में अल्पसंख्यकों को हिंसक हमलों, जबरन धर्मांतरण और घर वापसी जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।

 

9) बीजेपी शासित राज्यों में अपराध सर्वाधिक

मोदी जी ने अपराध के मामले में भी यूपी को न. 1 बताकर गुमराह करने का काम किया है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो 2015 के अनुसार सच्चाई ये है कि हत्या, रेप और अपहरण के मामलों में बीजेपी की सरकारों वाले राज्य झारखंड, हरियाणा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र व अकाली दल के साथ उनकी गठबंधन वाली सरकार के पंजाब राज्य दूसरे प्रदेशों से कहीं आगे हैं।

 

10) विदेश यात्राओं के बाद भी एनएसजी सदस्यता दिलाने में नाकाम

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दो साल के कार्यकाल में कई देशों की यात्रा की। इसके बाद भी न तो वे देश को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में जगह दिलाने में कामयाब रहे और ना ही विदेशों से कोई बड़ा करार या निवेश ला पाने में सफल हुए।

 

 

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